राजीव वर्मा
चुप रहकर जीना क्या जीना,
मन की आवाज़ दबाकर क्या पाना…
जो कहना था कह न सके,
तो शब्दों का संसार मिट जाता है,
और जब सोच रुक जाती है,
तो इंसान अंदर ही अंदर मर जाता है।
जीवन तो धड़कनों से कहीं आगे है,
यह जज़्बातों का सफ़र है,
सवालों की नदी है,
और सपनों का आकाश है।
जो सपनों से दूर भागे,
वो ज़िंदगी की रोशनी नहीं देख पाते।
कहते हैं—
“शरीर मरता है बस एक बार,”
पर सच यह है—
खामोशी और बेबसी में,
इंसान कई बार मरता है।
जो सोचता है, वह बदलता है,
जो बोलता है, वो संभलता है,
जो जीता है अपने सच्चे स्वर में—
वही सच में ज़िंदा कहलाता है।
तो बोलो जब दिल कहे,
सोचो जब मन उलझे,
डरो मत, थमो मत, रुक मत—
क्योंकि जीवन वहीं है
जहाँ तुम्हारा साहस सांस लेता है।
जिंदा वही है,
जो खुद को खोने नहीं देता।
जो सपनों को चुप्पी की नहीं,
हिम्मत की भाषा सिखाता है।