राजीव वर्मा
भोजन का त्याग (उपवास) करने से ईश्वर कभी खुश नहीं होते, अगर त्याग करना है तो अपने गंदे विचार, अहंकार और गंदे कर्मों का करिए।
मनुष्य जब आध्यात्मिकता की ओर कदम बढ़ाता है, तो वह अक्सर यह भ्रम पाल लेता है कि ईश्वर को प्रसन्न करने का मार्ग केवल उपवास, तपस्या या भोजन त्याग के माध्यम से है। लेकिन वास्तव में ईश्वर किसी के भूखे रहने से प्रसन्न नहीं होते, बल्कि वह मनुष्य के मन, कर्म और चरित्र की पवित्रता से आनंदित होते हैं। भोजन त्याग शरीर को कष्ट देता है, लेकिन बुरे विचारों और गलत व्यवहारों का त्याग आत्मा को शुद्ध करता है। और ईश्वर वही चाहते हैं—आत्मिक शुद्धि, न कि केवल शारीरिक तपस्या।
मनुष्य के भीतर कई प्रकार की अशुद्धियाँ छिपी होती हैं—अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, लालच, स्वार्थ और हिंसा। ये अशुद्धियाँ ही इंसान को पतन की ओर धकेलती हैं। जब तक मन शुद्ध नहीं होगा, भोजन त्याग का कोई अर्थ नहीं। जिस तरह गंदे घर में सुगंधित फूल भी अपनी खुशबू खो देते हैं, वैसे ही गंदे मन में भक्ति का कोई प्रभाव नहीं रहता।
ईश्वर के लिए भोजन त्याग या भूखे रहना कोई महान कार्य नहीं, क्योंकि भगवान स्वयं अनन्त, पूर्ण और सर्वशक्तिमान हैं। उन्हें न भोजन की आवश्यकता है, न हमारे तप की। वह केवल हमारे विचारों की पवित्रता और व्यवहार की सरलता चाहते हैं।
कई लोग दिखावे के लिए उपवास करते हैं, लेकिन उनके मन में दूसरों के प्रति घृणा, कटाक्ष और श्रेष्ठता का भाव भरा होता है। ऐसे व्यक्ति बाहरी रूप से भक्त दिखाई देते हैं, पर भीतर उनके मन में आध्यात्मिकता की जगह अहंकार वास करता है। ऐसे लोगों के लिए उपवास केवल एक कर्मकांड बनकर रह जाता है।
यदि सच में त्याग करना है, तो त्याग की शुरुआत मन से होनी चाहिए—
– त्यागिए अहंकार, क्योंकि अहंकार ईश्वर से दूर कर देता है।
– त्यागिए दूसरों का अपमान करना, क्योंकि हर व्यक्ति ईश्वर की ही रचना है।
– त्यागिए बुरे शब्द और कटु वाणी, क्योंकि शब्दों में निर्माण और विनाश की शक्ति होती है।
– त्यागिए कपट, झूठ और स्वार्थ, क्योंकि ये आत्मा को कमजोर बना देते हैं।
त्याग का अर्थ भूखे रहना नहीं, बल्कि मन को भूखों रखना—गुस्से, नफरत और नकारात्मकता से दूर रखना है।
सच्ची भक्ति तब होती है जब मनुष्य हर परिस्थिति में अपने विचारों को नियंत्रित करे और हर आत्मा में ईश्वर को देखना सीखे। यही वह मार्ग है जिससे ईश्वर प्रसन्न होते हैं—जब मनुष्य अपने व्यवहार, भावनाओं और कर्मों से दुनिया में प्रेम, शांति और सद्भाव फैलाता है।
उपवास का वास्तविक उद्देश्य शरीर को कमजोर करना नहीं, बल्कि मन को मजबूत बनाना है। यह आत्म-नियंत्रण, अनुशासन और संयम का अभ्यास है। यदि उपवास केवल पेट से किया जाए और मन को स्वच्छ न किया जाए, तो उसका कोई आध्यात्मिक महत्व नहीं।
अंत में, ईश्वर वही हैं जो हमारे हृदय की भावना को देखते हैं, न कि हमारे भोजन की थाली को। इसलिए यदि त्याग करना ही है, तो त्यागिए— द्वेष का, क्रोध का, स्वार्थ का, नफरत का और उन सभी विचारों का जो आपको ईश्वर से दूर करते हैं। क्योंकि भोजन त्याग से शरीर कमजोर होता है, परंतु बुरे विचारों का त्याग मनुष्य को ईश्वर के करीब लाता है।