राजीव वर्मा
तुलना की नजर जब मन पर छा जाती है,
अंदर की रोशनी धीरे-धीरे बुझ जाती है।
दूसरों की ऊँचाइयों को निहारते-निहारते,
अपनी ही जमीन आंखों से ओझल हो जाती है।
ईर्ष्या का बीज कोई और नहीं बोता,
हम ही अपने हाथों इसे सींचते जाते हैं।
दूसरों की खुशियों में कांटे ढूंढते-ढूंढते,
अपने हृदय की मिट्टी को बंजर बनाते जाते हैं।
तुलना का खेल बड़ा ही खतरनाक होता है,
यह जीत से पहले ही हार का स्वाद चखाता है।
जो खुद को दूसरों के तराजू में तोलता है,
वह अपने मूल्य को हर दिन थोड़ा-थोड़ा खोता है।
ईर्ष्या मन को छोटा कर देती है,
व्यक्ति की उड़ान को सीमित कर देती है।
दूसरों की चमक देखकर दुखी होने की बजाय,
अपनी ही रोशनी पर हमें विश्वास करना चाहिए।
हर इंसान का सफर अलग होता है,
हर मंज़िल की रफ़्तार भी अलग होती है।
तुलना से ना कोई आगे बढ़ता है,
ना खुशी मिलती है, ना शांति मिलती है।
अगर जीतना है तो खुद से जीतिए,
अगर बढ़ना है तो खुद को बढ़ाइए।
ईर्ष्या के साए में जीवन मत बिताइए,
अपनी खूबियों की रोशनी में चमकना सीखिए।
तुलना छोड़ दें तो मन विशाल बनता है,
ईर्ष्या त्याग दें तो इंसान कमाल बनता है।
जो अपनी राह पर सच्चाई से चलता है—
वही सबसे ऊँचा और सबसे बड़ा बनता है।