राजीव वर्मा
मानव जीवन केवल जन्म, कर्म और मृत्यु का क्रम नहीं है। यह एक अनुभव है — गहराई, चेतना और सत्य की खोज का। अस्तित्व, जिसे हम ब्रह्मांड कहते हैं, हमेशा हमें संदेश देता है:
“जागो, जीओ, और आनंदित रहो।”
ब्रह्मांड न तो हमारे दुख से प्रसन्न होता है और न हमारी पीड़ा से प्रभावित। वह केवल इतना चाहता है कि मनुष्य अपने भीतर छिपी उस चेतना को पहचानें, जो आनंद, प्रेम और शांति का स्रोत है। हमारा अस्तित्व इस धरती पर केवल जीने के लिए नहीं, बल्कि पूर्ण रूप से जागृत होकर जीने के लिए है।
खुशी हमारी प्रकृति है
हम समझते हैं कि खुशी बाहरी चीज़ों — धन, संबंधों, उपलब्धियों या सम्मान — में मिलती है। लेकिन सत्य इसके विपरीत है।
खुशी हमारी प्रकृति है, खोज नहीं।
बच्चे बिना कारण मुस्कुराते हैं, प्रकृति बिना प्रयास के सुंदर है — क्योंकि वे अपने अस्तित्व के स्वभाव के करीब हैं।
ब्रह्मांड यह चाहता है कि हम उस सहजता को फिर से खोजें।
मनुष्य — खुद का सबसे बड़ा बाधक
दुख की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इंसान अपनी पीड़ा खुद पैदा करता है।
कभी अतीत को न छोड़ पाने में, कभी भविष्य की चिंता में, कभी दूसरों को नियंत्रित करने की चाह में, तो कभी स्वयं से संतुष्ट न होने में।
हम सोचते हैं दुनिया हमें दुख देती है, लेकिन असल में हमारे विचार, हमारी अपेक्षाएँ, हमारा अहंकार ही हमारे सुख के बीच दीवार बन जाते हैं।
ब्रह्मांड हमें दोष नहीं देता, वह बस प्रतीक्षा करता है — कि कब हम अपने अंदर की कैद खोलकर खुलकर जीना शुरू करेंगे।
जागृति का क्षण
जागृति तब आती है जब मनुष्य समझता है:
– कि शांति भीतर है, बाहर नहीं।
– कि प्रेम पाने से पहले देना जरूरी है।
– कि नियंत्रण शक्ति नहीं, स्वीकार्यता शक्ति है।
– कि जीवन एक संघर्ष नहीं, एक उपहार है।
जब यह समझ भीतर उतर जाती है, तब जीवन बदलने लगता है — धीरे, सहज, लेकिन गहराई से।
जीवन का उद्देश्य जीना है, बस जीना अस्तित्व हमें केवल एक संदेश देता है:
“जीवन को बोझ मत बनाओ, अनुभव बनाओ। खुद को मत खोओ, खुद को पहचानो। दुख में मत फंसो, जागो — क्योंकि तुम यहां एक उद्देश्य के साथ हो — जीने के लिए, खिलने के लिए, और आनंद के लिए।“
मानव जीवन एक अवसर है — और इसका सम्मान करने का पहला कदम है:
* स्वयं के खिलाफ न लड़ना,
* स्वयं के साथ होना।