राजीव वर्मा
जीवन में हम सभी रिश्ते बनाते हैं—खून के, प्रेम के, दोस्ती के, और कभी-कभी ऐसे भी जो शब्दों से नहीं, सिर्फ महसूस किए जाते हैं। शुरुआत में सब कुछ सुंदर लगता है, क्योंकि रिश्ते हमें अपनापन देते हैं, सुरक्षा देते हैं और जीवन को अर्थ देते हैं। लेकिन धीरे-धीरे वही रिश्ते हमारे लिए दर्द का कारण बन जाते हैं। क्यों? क्योंकि रिश्ता तभी तक हल्का होता है जब तक उसमें अपेक्षा नहीं जुड़ती।
जब हम किसी से लगाव रखते हैं, तो उसके व्यवहार, शब्दों और मौजूदगी से एक भावनात्मक बंधन बन जाता है। और फिर धीरे-धीरे यह लगाव अपेक्षा बन जाता है—
कि वह हमेशा हमारे साथ रहेगा, हमारी बात समझेगा, हमारी भावनाओं का सम्मान करेगा, और बदले में वही देगा जो हम देते हैं।
लेकिन सच्चाई यह है कि दुनिया में हर व्यक्ति अलग है।
हर इंसान अपना जीवन, अपनी सोच और अपनी परिस्थितियों के आधार पर जीता है। इसलिए जब हमारी उम्मीदें पूरी नहीं होतीं, तो वही रिश्ते जो कभी खुशी देते थे, अब दुख देने लगते हैं।
लगाव हमें बाँधता है, और अपेक्षा हमें कमजोर बनाती है।
हम सोचते हैं कि प्यार, दोस्ती, या पारिवारिक रिश्ता हमें खुश रखेंगे। लेकिन असल में तकलीफ़ तब होती है जब हम यह मान लेते हैं कि सामने वाला हमेशा वैसा ही रहेगा जैसा अभी है। रिश्ते बदलते हैं, लोग बदलते हैं, भावनाएं बदलती हैं—और यही जीवन का स्वाभाविक सत्य है।
तो क्या समाधान है?
समाधान यह नहीं कि रिश्ते तोड़ दिए जाएँ—
बल्कि यह कि उन्हें अपनापन दें, लेकिन स्वामित्व नहीं।
प्यार करें, पर बाँधे नहीं।
जुड़ें, पर खुद को खोएँ नहीं।
और सबसे जरूरी—
देने की इच्छा रखें, लेने की अपेक्षा नहीं।
जब हम रिश्तों को स्वतंत्रता, सम्मान और स्वीकृति के साथ जीते हैं, तब वही संबंध हमें दर्द नहीं, बल्कि शांति देते हैं।
लेकिन जब हम लोगों को पकड़कर रखते हैं, अपनी शर्तों पर, अपनी कल्पनाओं के मुताबिक, तब वही रिश्ता बोझ बन जाता है।
सच्चा प्रेम अपनापन देता है, लेकिन अधिकार नहीं।
सच्ची मित्रता साथ देती है, लेकिन शर्तों में नहीं।
और सच्चे रिश्ते दर्द नहीं—बल्कि विकास देते हैं।
इसलिए कभी-कभी छोड़ देना—
दूर होना—
या स्वीकार करना—
कमज़ोरी नहीं होती…
वह आत्म-सम्मान होता है