राजीव वर्मा
परिवर्तन प्रकृति का मूल सिद्धांत और अस्तित्व का आधार है। संसार में कोई भी वस्तु स्थिर नहीं है—न समय, न परिस्थितियाँ और न ही मानव जीवन। जैसा कि कहा गया है, “परिवर्तन अत्यंत कष्टदायी होता है, परन्तु उतना ही आवश्यक भी।” यह वाक्य मात्र शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि जीवन के गहन सत्य का दर्पण है। परिवर्तन हमें झकझोरता है, हमारे स्थापित विश्वासों, हमारी दिनचर्या और हमारे comfort zone को तोड़ देता है। यही विरोध, यही असहजता और यही दर्द परिवर्तन का पहला चरण बनते हैं।
मानव जीवन का प्रत्येक अध्याय परिवर्तन से निर्मित है। जन्म से लेकर मृत्यु तक हमारी यात्रा लगातार रूपांतरणों से होकर गुजरती है। एक शिशु का पहला कदम, विद्यालय की पढ़ाई, मित्रता, युवावस्था की महत्वाकांक्षाएँ, नौकरी की चुनौतियाँ, रिश्तों की जटिलताएँ, उम्र के साथ शरीर में होने वाले बदलाव—यह सब परिवर्तन ही हैं। जब एक बच्चा विद्यालय छोड़कर कॉलेज की ओर बढ़ता है, तो स्वतंत्रता का आकर्षण उसे रोमांचित करता है, परंतु नई जिम्मेदारियों और अनजान वातावरण का भय मन में उथल-पुथल मचाता है। इसी प्रकार नौकरी बदलना भविष्य के अवसरों का द्वार खोलता है, लेकिन नई परिस्थितियों के साथ तालमेल बैठाने का मानसिक संघर्ष हमें असहज बनाता है। यही संघर्ष परिवर्तन की कीमत है और यही दर्द हमें विकसित करता है।
परिवर्तन केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं है; समाज भी परिवर्तन के चक्र से बंधा हुआ है। यदि समाज परिवर्तन को स्वीकार नहीं करेगा, तो वह धीरे-धीरे जड़ हो जाएगा और समय के साथ समाप्त हो जाएगा। इतिहास इस तथ्य का साक्षी है—सामाजिक सुधार, राजनीतिक आंदोलन, तकनीकी प्रगति और सांस्कृतिक जागरूकता ने मानव सभ्यता को एक आदिम अवस्था से आधुनिक युग तक पहुँचाया है। इंटरनेट और मोबाइल संचार इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। शुरुआत में इन्हें संदेह की दृष्टि से देखा गया, परंतु आज वे मानव जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। बदलाव के दौरान विरोध और संघर्ष यह प्रमाणित करते हैं कि परिवर्तन की राह सरल नहीं होती, परंतु उसका परिणाम हमेशा व्यापक और दूरगामी होता है।
दार्शनिक दृष्टि से देखा जाए तो परिवर्तन हमें अनुकूलन (adaptation) की कला सिखाता है। चार्ल्स डार्विन का सिद्धांत “survival of the fittest” यही इंगित करता है कि वही जीव, वही मनुष्य और वही समाज आगे बढ़ते हैं जो परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को बदलना जानते हैं। परिवर्तन हमें लचीला बनाता है, हमारी अंतर्निहित क्षमता को उजागर करता है और हमारे भीतर आत्मविश्वास की नई धारा प्रवाहित करता है। जब हम किसी परिवर्तन को स्वीकार करते हैं और उससे उभरते हैं, तो हम स्वयं के एक नए और अधिक सशक्त संस्करण में परिवर्तित हो जाते हैं।
वास्तव में, परिवर्तन दोधारी तलवार की तरह है—एक ओर वह पीड़ा, अनिश्चितता और भय लेकर आता है; दूसरी ओर वही परिवर्तन विकास, अवसर और उत्कर्ष के द्वार खोलता है। इसलिए हमें परिवर्तन से पीछे हटने के बजाय उसे जीवन की आवश्यकता के रूप में स्वीकार करना चाहिए। जो व्यक्ति परिवर्तन को समझता है, उसे अपनाता है और उससे सीखता है, वही जीवन की वास्तविक बुद्धिमत्ता प्राप्त करता है।
अंततः, परिवर्तन केवल स्थिति नहीं, बल्कि चेतना का रूपांतरण है। यह हमें बताता है कि कुछ भी स्थायी नहीं है—न सुख, न दुःख, न परिस्थितियाँ, न जीवन। परिवर्तन ही सत्य है, और उसे स्वीकार करना ही परिपक्वता है।