राजीव वर्मा
कहते हैं कि समय बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं, और इंसान भी बदलते हैं। लेकिन आज जिस दौर में हम जी रहे हैं, उसे कई लोग कलयुग कहते हैं — एक ऐसा समय जहाँ संवेदनाएँ कमजोर पड़ गई हैं, और इंसान की सोच स्वार्थ और तुलना के दायरे में कैद होकर रह गई है।
इस समय की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि लोग दूसरों के दुख को उनके कर्मों की सज़ा मान लेते हैं, और जब वही दुख उनके जीवन में आता है तो उसे ईश्वरीय परीक्षा कहकर खुद को सांत्वना दे देते हैं। यह सोच न केवल रिश्तों को खोखला कर देती है, बल्कि इंसानियत को भी कमज़ोर कर देती है।
दूसरों की तकलीफ़ का मज़ाक क्यों?
बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो दूसरों के दर्द को महसूस कर सकें, समझ सकें या उससे सीख सकें। अधिकांश लोग किसी के दर्द को देखकर कहते हैं—
“ये उसी के कर्मों की वजह से हो रहा है।”
ऐसा इसलिए क्योंकि जज करना आसान है, और समझना, सहानुभूति रखना मुश्किल।
जब किसी दूसरे के जीवन में दुख आता है — चाहे वह आर्थिक समस्या हो, रिश्तों में टूटन हो या स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानी — लोग सलाह देने से ज्यादा हंसी उड़ाने में जल्दी करते हैं। दोष ढूंढना आसान है, लेकिन मदद का हाथ बढ़ाना कठिन।
अपनी तकलीफ़ को परीक्षा क्यों मानते हैं?
जब वही लोग अपने जीवन में संकट का सामना करते हैं, तब अचानक उनकी दृष्टि बदल जाती है। तब उन्हें लगता है
“ईश्वर मेरी परीक्षा ले रहे हैं।”
क्योंकि अपने प्रति हम हमेशा दयावान रहते हैं। अपने लिए हम बहाने, तर्क, और संवेदनाएँ ढूंढ लेते हैं। लेकिन यही दृष्टिकोण अगर हम दूसरों के लिए भी रख पाएं, तो समाज में करुणा और मानवता का स्तर कहीं ऊँचा होगा।
असली इंसानियत क्या है ?
इंसानियत का अर्थ है दूसरों को उसी नज़रों से देखना, जैसे हम खुद को देखते हैं। अगर हम याद रखें कि हर इंसान अपने संघर्षों से लड़ रहा है, हर किसी की कहानी अनसुनी है, तो हम कभी भी दूसरों के दर्द पर टिप्पणी नहीं करेंगे, बल्कि मदद या कम से कम सहानुभूति देना सीखेंगे।
बदलाव कहाँ से शुरू होगा?
– बदलाव हमेशा बाहरी दुनिया से नहीं, खुद से शुरू होता है।
– किसी पर टिप्पणी करने के बजाय समझने की कोशिश करें।
– दूसरों की असफलता का मज़ाक बनाने के बजाय उनसे सीखें।
– दूसरों के दर्द को उनके कर्मों का फल कहने के बजाय इंसानियत दिखाएँ।
– और सबसे महत्वपूर्ण — दूसरों के लिए वही सोचें, जो आप अपने लिए चाहते हैं।
निष्कर्ष यह है कि समय बदल गया है, लेकिन अभी भी उम्मीद बाकी है। अगर हम थोड़ी सी संवेदना, सहानुभूति और समझ को अपने व्यवहार में शामिल कर लें, तो दुनिया वैसे ही खूबसूरत हो सकती है जैसी वह बनने के लिए बनाई गई थी।
क्योंकि अंत में, कर्मों की सज़ा और ईश्वर की परीक्षा का फर्क नहीं होता — फर्क सिर्फ सोच और दृष्टिकोण का होता है।