Rajeev Verma
बदलाव धीरे-धीरे आता है,
ठंडी हवा के झोंके-सा चुपके से,
रात की खामोशी में बहती किसी
अनसुनी दुआ के स्वर जैसा।
शुरुआत में हम पहचान भी नहीं पाते—
कि कुछ भीतर कहीं हल्का-सा हिल रहा है,
आदतें पुरानी टूटने लगती हैं,
सोच के ताले जंग छोड़ने लगते हैं,
और दिल की धरती पर
नई उम्मीदों की हरियाली उगने लगती है।
धीरे-धीरे कदम बदलते हैं,
नज़रें बदलती हैं,
और रास्तों पर चलने का अंदाज़ भी
अनजाने में नया हो जाता है।
लोग कहते हैं—
“अरे, तुम तो पहले जैसे नहीं रहे!”
पर वे क्या जानें कि परिवर्तन
किसी तूफ़ान की देन नहीं होता,
यह तो भीतर जन्मी
लाखों छोटी-छोटी समझों का पहाड़ है।
समय अपना काम चुपचाप करता रहता है—
धीमी आग पर पकती किसी ख्वाहिश की तरह,
अधूरी इच्छाओं के आँसुओं को
हिम्मत में बदलने की कला जैसा।
और फिर…
एक दिन,
एक पल,
एक मोड़ पर
बदलाव अचानक शेर की दहाड़ बनकर सामने आता है—
वही बदलाव
जिसे हमने कभी महसूस भी नहीं किया था।
उस दिन
ज़िंदगी अपनी पूरी शक्ल में नज़र आती है,
पुरानी दुनिया पीछे छूटती हुई लगती है,
और इंसान खुद को
पहले से ज़्यादा मज़बूत,
ज़्यादा साफ़,
ज़्यादा सच्चा पाता है।
सच यही है—
बदलाव धीरे-धीरे आता है…
मगर जब आता है, सब कुछ बदल देता है…!!
नई आँखें, नए सपने,
नई सोच, नया सफ़र—
सब कुछ जैसे फिर से जन्म ले लेता है।
और इंसान समझ जाता है—
किसी भी रात को सुबह बनने में
सिर्फ़ एक किरण ही काफी होती है।