Rajeev Verma
बदलाव धीरे–धीरे आता है…
मगर जब आता है, सब कुछ बदल देता है…!!
बदलाव कभी शोर मचाकर नहीं आता,
वह तो किसी कोने में चुपचाप पनपता है,
एक हल्की-सी हवा बनकर मन को छूता है,
और हम समझ भी नहीं पाते कि
कब भीतर का मौसम बदलने लगा है।
शुरुआत होती है एक छोटी-सी चाहत से,
फिर वह इच्छा आदत बन जाती है,
आदत से हौसला, और हौसले से रास्ता—
बस यूँ ही, बिना आवाज़ किए,
ज़िंदगी नई दिशा पकड़ लेती है।
बदलाव धीरे–धीरे आता है…
कभी सुबह की पहली किरण की तरह,
कभी शाम के उतरते साए की तरह,
जो धीरे-धीरे धरती पर फैलते-फैलते
हर रंग को नया अर्थ देने लगते हैं।
लोग कहते हैं—
“कुछ नहीं बदल सकता!”
पर वक्त की रेत पर कदम रखने वाला जानता है
कि एक हल्की-सी लहर भी
सालों पुराने निशान मिटा देती है।
हमें लगता है कि हम वैसे ही हैं
जैसे कल थे,
पर भीतर कहीं—
सोच की मिट्टी में,
सपनों के बीजों में,
चाहतों की धड़कनों में—
कोई छोटा-सा अंकुर
धीरे से सिर उठा चुका होता है।
और फिर एक दिन—
जब वह अंकुर पेड़ बन जाता है,
जब सपने पंख खोल उड़ान भर देते हैं,
जब मन पुरानी सीमाओं को तोड़ देता है,
तब एहसास होता है कि
“हाँ, बदलाव आ चुका है।”
मगर जब आता है—
सब कुछ बदल देता है…!!
पुराने डर, पुरानी बातें,
टूटी उम्मीदें, धुंधले चेहरे—
सब पीछे छूट जाते हैं।
वह हमें नया बनाता है,
नई राहें देता है,
नई सोच देता है,
और कभी-कभी—
नई दुनिया तक पहुँचा देता है।
इसलिए डरो मत…
अगर अभी कुछ नहीं बदल रहा,
तो बस भरोसा रखो—
अंदर बहुत कुछ बदल रहा है।
क्योंकि बदलाव धीरे–धीरे आता है…
पर जब आता है—
सब कुछ बदल देता है…!!