Rajeev Verma
जीवन–रण में मुझ अर्जुन का कवच बन
लड़ने को तैयार तुम्हीं तो करते हो केशव।
जब-जब मन थक जाता है, राहें फीकी पड़ जाती हैं,
जब भीतर का दीपक बुझने लगता है,
तब तुम ही कहीं से एक किरण बनकर आते हो—
हथेली पर साहस रखकर कहते हो,
“चल, मैं हूँ न… तू बस कदम बढ़ा।”
कैसा भी संकट हो, कैसी भी पीड़ा,
मेरी डगमगाती दृष्टि को स्थिर
तुम्हारी ही मुस्कान करती है, माधव।
रथ हांकने वाले तुम,
पर दिशा चुनने का विश्वास भी तुम ही देते हो।
क्या महँगा, क्या सस्ता — कुछ परवाह नहीं,
मेरा बंटाधार तुम्हीं तो करते हो केशव।
दुनिया की नजरों में हार–जीत के अर्थ बदलते रहते हैं,
पर तुम सिखाते हो—
“अर्जुन, कर्म ही यज्ञ है, बाकी सब मृग-तृष्णा।”
जब मन उलझ जाता है अपनी ही बनाई जालियों में,
तुम धैर्य का वाद्य बजाकर
मुझे फिर से जीवन की लय में बांध देते हो।
गोपियों के प्रिय, अर्जुन के सारथी,
द्वारका के राजा, वृंदावन के कान्हा—
तुम कहीं भी रहो,
मेरे हृदय में तो बस एक मित्र के रूप में हो।
जैसा हूँ, स्वीकार तुम्हीं तो करते हो केशव।
बिना शर्त के प्रेम तुम्हीं तो करते हो केशव।
न कोई मांग, न कोई सौदा,
बस एक सहज, निर्मल अपनापन—
जिसमें न गणित है, न लाभ–हानि का हिसाब।
तुम्हारे चरणों में रखी हुई मेरी थकान,
मेरी व्यथा, मेरा अहंकार—
सब गंधर्व-शक्ति बनकर उड़ जाते हैं।
हे वंशीवट के वासुदेव,
मेरी आँखों को वो दृष्टि दो
जो हर परिस्थिति में तुम्हारा संकेत देख सके।
मेरे मन को वो शांति दो
जो गीता की पंक्तियों सा अडिग रहे।
मेरे कर्मों को वो पवित्रता दो
जो संसार में तुम्हारी गंध फैलाए।
हे माधव, हे श्यामसुंदर,
जब तक साँसें चलें
तुम्हारा नाम मेरा प्राण-सार बने रहे।
जीवन–रण में मैं योद्धा सिर्फ तभी हूँ
जब सारथी तुम हो।