Rajeev Verma
हमारी पीढ़ी – 1950 से 2025 वाली:
वही लेजेंडरी “50–80 की ओर बढ़ती” सुपरहिट जनरेशन!
अगर किसी को सच में जीवन के सारे बदलाव देखने हों—टाइम मशीन की ज़रूरत नहीं है।
बस हमारी 1950–2025 वाली पीढ़ी को देख लो!
जो खुद तो उम्र के हिसाब से 50–80 की रेंज में पहुँच गई है,
लेकिन दिल अभी भी 18 का और घुटने 80 के हैं।
हमारी बचपन की करेंसी:
1, 2, 5, 10, 20, 25, 50 पैसे
आज के बच्चों को बताओ कि “15 पैसे में समोसा मिलता था,”
तो वे आपको UNBELIEVABLE कहते हुए रील बना देंगे।
ये वही पीढ़ी है जो मेहमानों से पैसे ऐसे लेती थी
जैसे Paytm Cashback हो !
हम टेक्नोलॉजी से डरे नहीं—उसे झेला है
हमने स्याही–कलम से शुरुआत की,
और आज सोशल मीडिया पर स्टेटस भी डालते हैं और स्टेटस को समझते भी नहीं।
स्मार्टफोन ऐसे चलाते हैं जैसे
वॉट्सऐप हमारी ही खोज हो।
साइकिल विलासिता थी
जिसे बचपन में साइकिल मिल जाए
वह मोहल्ले का रतन टाटा बन जाता था।
आज वही पीढ़ी कार ऐसे चलाती है
जैसे किसी को भी न चलानी आती हो।
टेप–रिकॉर्डर और पॉकेट ट्रांजिस्टर
इनको हाथ में लेकर चलना मतलब
“भैया, मेरी कमाई शुरू हो गई है।”
VCR का भाड़ा मिलकर इकट्ठा करते थे
और रात भर ‘4–5 फिल्में एक साथ’ देखकर
नींद की ऐसी–तैसी करते थे।
हमारी ब्रेकिंग न्यूज़
आज की तरह नोटिफिकेशन नहीं आते थे।
हमारी ब्रेकिंग न्यूज़ सिर्फ एक थी—
“तेरे पापा स्कूल में आ गए हैं, जल्दी भाग!”
हमारे खेल – जिम की ज़रूरत नहीं
कुकर की रिंग्स लेकर “गाड़ी–गाड़ी”
सलाई को मिट्टी में गाड़ना
नंगे पाँव क्रिकेट
कच्चे आम तोड़ना
इतनी Physical activity तो आज के बच्चे
फिटनेस ऐप में भी नहीं करते।
मोहल्ले वाला परिवार
किसी के भी घर की कुंडी खटखटाना?
अरे… ये तो routine था!
“दोस्त की मम्मी ने खिला दिया”—
यहां कोई EMI का सिस्टम नहीं था।
और “उसके पापा ने डांटा”—
इसमें jealousy नहीं, Unity थी।
स्टारडम और हमारी पसंद
हमने सुनील गावस्कर की सीधी गेंदें देखीं,
पीट सम्प्रस का टेनिस,
धर्मेंद्र की मर्दानगी,
राजेश खन्ना की आंखों की भाषा,
अमिताभ की गूँज,
और शाहरुख का फैलाया हुआ हाथ—
सब देखा है!
हम सब पर फिदा थे—
और उस पर भी जो आज तक समझ नहीं आया कि फिदा क्यों थे।
स्कूल की कड़वी–मीठी पिटाई
शिक्षक से पिटना…
बिल्कुल सामान्य था।
डर ये था कि
घर पर बता दिया गया
तो Bonus पिटाई मिलेगी।
हमारी लव–स्टोरीज़
न मोबाइल
न व्हाट्सऐप
न इंस्टा
बस मिलने की आतुरता।
लड़की से बात कर ली?
बधाई हो—आप ADVANCE हैं।
हमारी क्रिएटिविटी
कपड़े की थैली, टिन का बक्सा,
किताब में मोरपंख,
कवर चढ़ाना मानो वार्षिक उत्सव!
पॉकेट मनी?
वो क्या होता है?
हमने सच में जीया है
छोटी–छोटी खुशी,
कम सुविधाएँ,
जी भर कर दोस्ती,
और बिना फिल्टर की जिंदगी।
आज के बच्चे जी रहे हैं…
WiFi on, WiFi off।
हम जीते थे…
दिल on, दिमाग off।
कहने को बस इतना—
हम अच्छी पीढ़ी थे या बुरी—
यह बहस लंबी हो जाएगी।
लेकिन…
हमारा भी एक ज़माना था—और क्या ज़बरदस्त था !