Rajeev Verma
बढ़ती उम्र की पगडंडी पर जब धूप ज़रा नरम पड़ जाए,
जब मन थोड़ा थक-सा बैठे, और जीवन गुनगुनाने लग जाए…
तभी समझ आता है—कुछ बातें पकड़कर रखना बोझ हैं,
और कुछ बातों को मुस्कुराकर,
बस छोड़ दीजिए।
एक-दो बार समझाने पर भी
यदि कोई आपकी बात न समझे,
तो उसे समझाने की मशक्कत में
अपना मन क्यों घुलाइए?
लोगों की सोच का ताला,
आपकी चाबी से खुले ये ज़रूरी तो नहीं—
ऐसे में अपने दिल का ताप घटाइए,
और समझाना…
छोड़ दीजिए।
बच्चे जब बड़े हो जाएँ,
अपने फैसले खुद करने लगें,
तो उनके पीछे-पीछे
छाया बनकर चलने की आदत—
अब बदल दीजिए।
वो अपनी दुनिया के राजा हैं,
आप अपने अनुभवों के समंदर—
इसलिए उनकी हर बात को पकड़कर
मन में उलझन पैदा करना भी,
धीरे से…
छोड़ दीजिए।
दुनिया में गिने-चुने लोग ही
हमारी धुन पर चल पाते हैं,
बाकी तो सब अपने सुर के मालिक।
यदि एक-दो लोग आपके विचारों से न मिलें,
तो इसे दिल पर क्यों लीजिए?
विचारों में अंतर जीवन का संगीत है—
इस पर रंज करना,
छोड़ दीजिए।
एक उम्र के बाद
यदि कोई आपको न पूछे,
या पीछे से कुछ गलत कह दे—
तो उसकी आवाज़ को
अपनी आत्मा की खिड़की में मत घुसने दीजिए।
कौन क्या कह रहा है,
ये हवा का शोर है—
इसे अपने भीतर तक आने देना,
अब…
छोड़ दीजिए।
जब समझ आने लगे
कि हाथ में बहुत कम है,
और समय की मुट्ठी रेत की तरह
फिसलती जा रही है,
तो भविष्य की चिंता में
अपनी नींद उड़ाना क्यों?
भविष्य की डोर खींचना
हमारे बस की बात नहीं—
ये तनी हुई रस्सी पकड़ने का भ्रम है,
इस भ्रम में जीना…
छोड़ दीजिए।
यदि इच्छा और क्षमता में
अब फर्क दिखने लगे,
तो खुद से कठोर अपेक्षा कर
दिल को मत दुखाइए।
आज जो कर सकते हैं,
उसे प्रेम से कीजिए—
जो नहीं कर पाते,
उसका बोझ उठाना…
छोड़ दीजिए।
हर किसी का पद अलग,
कद अलग, और मद अलग।
दूसरों से खुद की तुलना कर
मन का दर्पण धुंधला मत कीजिए।
हर व्यक्ति का सफर,
अलग राह, अलग मंज़िल—
तुलना की इस अंतहीन दौड़ में
खुद को थकाना…
छोड़ दीजिए।
बढ़ती उम्र में
हर दिन की धूप अलग चमकती है,
हर शाम का रंग अलग मुस्कुराता है।
जीवन का रस लीजिए,
हर पल को गले लगाइए—
रोज जमा-खर्च की चिंता में
मन को बेचैन करना…
छोड़ दीजिए।
उम्मीदें होंगी तो
सदमे भी आएँगे,
लोग जितना चाहें
उतना बदलेंगे नहीं।
यदि सुकून चाहिए,
तो उम्मीदों का बोझ उतार दीजिए—
क्योंकि उम्मीदों की लाठी
अक्सर दुख का दरवाज़ा खटखटाती है।
इसलिए उम्मीदों का ताज पहनकर
जीवन जीना भी…
छोड़ दीजिए।
और हाँ—
ये संदेश, ये कविता,
यदि मन को छू जाए तो ठीक,
न छूए तो खुद को मजबूर मत कीजिए।
दुनिया फॉरवर्ड वाले विचारों पर नहीं चलती—
इस बात को दिल पर लेना भी
बस…
छोड़ दीजिए।