✍️ राजीव वर्मा
क्या मैं अब भी प्रेम में हूँ ?
एक दिन यूँ ही माँ से पूछा —
“माँ… क्या तुम अब भी पापा से प्रेम करती हो ?”
साठ बरस की संगिनी चुप रहीं,
चेहरे पर एक मुस्कान थी —
जैसे कह रही हों,
“कुछ बातें उम्र सिखाती है, शब्द नहीं।”
मैं लौट आया घर,और देखा,
उन्होंने लिखा था —
“कभी तुम पूछते हो —
क्या मैं अब भी उसे चाहती हूँ ?”
मैं मुस्कुरा देती हूँ,
मूर्खता नहीं तुम्हारे प्रश्न की,
बस इसलिए कि अब प्रेम वैसा नहीं दिखता,
जैसा तुम सोचते हो।
अब वो तितलियाँ नहीं,
न आतिशबाज़ियाँ।
अब वो जड़ है —
एक शांत भरोसा,
जो हिलता नहीं।
अब हृदय नहीं धड़कता तेज़,
पर आत्मा को सुकून देता है।
हाथ काँपते नहीं,
पर हर सुबह उठने की शक्ति देता है।
अब कोई चौंकाने वाला पल नहीं,
बस कुछ प्यारे अनुष्ठान हैं —
एक ही समय की कॉफ़ी,
तौलिया टाँगने पर अंतहीन बहसें,
और वो क्षण जब वह चुपचाप पास आकर
छींकने पर रज़ाई ओढ़ा देता है।
अब न फूलों की प्रतीक्षा,
न ख़तों की आस,
बस उसकी सुनवाई चाहिए,
जब पीठ दर्द करे,
उसका सहारा चाहिए,
जब मैं भीतर से टूट जाऊँ।
वो करता है —
बिना किसी शोर के,
बिना फ़िल्मी वादों के।
बस — मौजूद रहता है।
जीवनभर का प्रेम
एक गुप्त भाषा बन जाता है —
एक दृष्टि जो केवल वही समझता है,
जो साथ में हँसा है,
साथ में थका है,
और फिर भी साथ चलता रहा है।
तो हाँ —मैं अब भी प्रेम में हूँ,
पर आरंभ की हलचल से नहीं,
उस शांति से जो हमने साथ गढ़ी है।
उस विश्वास से, जो कहता है —
तूफ़ान में भी, वो मेरा आश्रय है।