राजीव वर्मा
रमेश शर्मा अभी-अभी सरकारी दफ़्तर से रिटायर हुए थे। पूरे जीवन नौकरी की भागदौड़ में बीत गया। महीने के अंत तक तनख्वाह आने का इंतज़ार, बच्चों की पढ़ाई, घर की ज़िम्मेदारियाँ—इन सबके बीच उनके अपने सपने कहीं दब गए थे। पर आज, रिटायरमेंट के बाद मिले 80 लाख रुपये देखकर पहली बार लगा कि शायद अब जीवन थोड़ा अपने लिए भी जी लिया जाए।
शाम को उनका इकलौता बेटा, विवेक, उनके कमरे में आया। उसके चेहरे पर एक अजीब सी उम्मीद झलक रही थी।“पापा,” उसने हिचकिचाते हुए कहा, “रिटायरमेंट पर आपको जो 80 लाख मिले हैं… उनमें से आधे मुझे दे दीजिए।”
रमेश जी ने चश्मा उतारकर बेटे के चेहरे को गौर से देखा। “क्या करोगे इतने पैसों का, बेटा?”विवेक ने बिना सोचे उत्तर दिया, “एक गाड़ी खरीदूँगा… और बाकी पैसों से आपकी बहू के लिए ज्वेलरी बनवानी है। वो काफी समय से मेरे पीछे पड़ी है। कहती है कि दोस्तों की बीवियाँ बेशकीमती गहने पहनती हैं, वो क्यों न पहने।”
रमेश जी कुछ क्षण चुप रहे। फिर गहरी सांस लेकर बोले—“बेटा, गाड़ी और ज्वेलरी अपनी कमाई से खरीदो। मैंने तुम्हें पढ़ाया-लिखाया, नौकरी दिलवाई। अब अपने शौक तुम खुद पूरे करो।”
उन्होंने मुस्कुराते हुए आगे कहा—“इन पैसों से मैं तुम्हारी माँ के लिए एक अच्छी सी कार खरीदूँगा और उसे भारत-भ्रमण करवाऊँगा। एक उम्र से उसके मन में कहीं छुपा एक सपना है—काश कभी ट्रेन और हवाई जहाज़ से देश देख सकूं! अब मैं उसके वो सपने पूरे करूँगा।”
विवेक का चेहरा उतर गया। उसने सोचा था कि पापा तुरंत पैसे उसके हवाले कर देंगे। परंतु बात विपरीत हो गई। वह गुस्से से कमरे से निकल गया और जाकर अपनी पत्नी को सब बताया।
“देखा ? मैंने कहा था न, बूढ़ों के पास पैसे आए, तो वो अपना शौक पूरा करने में लगा देंगे!” बहू ने ताना मारा।
कुछ ही देर में दोनों ने जल्दी-जल्दी सूटकेस पैक किया। “हम अलग रहेंगे। आपकी पुरानी सोच ने हमेशा हमें ही पीछे रखा है,” विवेक ने दरवाज़े पर खड़े-खड़े कहा।
जाते-जाते बहू बड़बड़ा रही थी—“बूढ़े-बुढ़िया की हड्डियाँ श्मशान जाने को तैयार हैं और इन्हें शौक चढ़ा है घूमने का…!”
दरवाज़ा बंद होते ही घर में सन्नाटा पसर गया। सुदेश शर्मा की आँखें नम हो गईं। “हमने क्या गलत किया रमेश ? ज़िन्दगी भर तो उनके लिए ही जीते रहे…” रमेश जी ने पत्नी के आँसू पोंछे। “गलत वहीं होता है सुदेश, जो अपने सपने मारकर भी खुश न रह पाए। हमने बेटे को देने में कभी कमी नहीं रखी। अब थोड़ा हम खुद के लिए जीते हैं।”
अगले ही हफ्ते रमेश जी ने कार खरीद ली। पहली बार सुदेश जी ने स्टेयरिंग सीट के बगल में बैठकर मुस्कुराते हुए कहा—“कहीं दूर चलें?”और कार मुंबई से शुरू होकर कश्मीर की वादियों तक, फिर राजस्थान के रेगिस्तानों से होती हुई दक्षिण के समुद्र किनारों तक पहुँच गई। हर जगह उन्होंने तस्वीरें बनाईं, यादें संजोईं, और अपने भूले-बिसरे सपनों को दोबारा जिया।
एक दिन होटल की बालकनी में चाय पीते हुए सुदेश जी बोलीं—“रमेश, पता है? पहली बार ऐसा लग रहा है कि हम वाकई जी रहे हैं।” रमेश मुस्कुराए—“कभी-कभी बूढ़े सपने भी जवान हो जाते हैं, सुदेश।”
कहानी का संदेश: जीवन भर बच्चों के लिए जीना अच्छी बात है, पर अपने हिस्से की खुशियों को पूरी तरह त्याग देना गलत है। हर इंसान को अपने सपने जीने का भी अधिकार है—चाहे उम्र कोई भी हो।