राजीव वर्मा
“मैं अभी ज़िंदा हूं…”
लड़के बाप को गले नहीं लगाते,
ना कभी बाप की गोद में सर रखकर सोते हैं।
बचपन में जो बाप की उंगली पकड़कर चले,
वही बड़े होकर फोन पर भी कम ही होते हैं।
बचपन में बाप था हीरो,
जिसने हर गिरती चाल संभाली थी।
स्कूल की फीस, नए जूते, बैग —
हर खुशी उसने हंसी में पाली थी।
पर वक्त बीता, लड़का जवान हुआ,
ख़्वाबों में, दुनियावी दौड़ में गुम हो गया।
बाप अब उतना जरूरी नहीं लगता,
क्योंकि वो “हमेशा” तो है ही —
यही भ्रम हो गया।
बाहर शहर में रहने वाला बेटा,
जब फोन करता है घर पर,
मां से बातें करता है हंसकर,
और उधर कोने में बैठा बाप —
धीरे से पूछता है, “कह दे उससे, टेंशन ना ले…”
“मैं अभी ज़िंदा हूं।”
वो आवाज़ धीमी है, पर दिल भारी,
उसके हर शब्द में अपनापन है सारी।
वो कहता नहीं, पर चाहता है सब कुछ कहना,
“बेटा, तेरा इंतज़ार अब भी है इस आंगन में रहना।”
वो शामें जब तू साइकिल से गिरता था,
और बाप दौड़ता था तेरे पीछे,
अब वही बाप छत से देखता है रास्ता,
कि कहीं तू दिखे किसी भी सींचे।
अब उसकी आंखें कमज़ोर हैं,
पर नज़र अब भी तुझपर है।
उसकी कमर झुकी है, पर उम्मीद नहीं,
वो अब भी मानता है तू उसका गर्व है।
वो याद करता है तेरे बचपन की बातें,
तेरी पहली साइकिल, तेरी हंसी की रातें।
अब जब तेरी आवाज़ आती है मोबाइल पर,
वो अपना सारा दर्द छुपा लेता है उस एक पल में।
“कह देना उससे, मैं ठीक हूं,
उससे कह देना, टेंशन ना ले।
बस आज थोड़ी थकान है सीने में,
पर दिल अब भी धड़कता है उसके लिए।
“कभी लौटकर देख लेना उस बूढ़े चेहरे पर,
जिसकी मुस्कान अब तेरे नाम से जुड़ी है।
तू शायद भूल गया हो उसे ज़िंदगी की रफ़्तार में,
पर वो अब भी तेरे हर कदम पर जुड़ी है।
और जब तू फिर कभी घर लौटे,
तो सिर्फ मां को ही नहीं गले लगाना,
उस बाप के कंधे पर सिर रखकर कहना —
“अब तू टेंशन मत ले,
मैं हूं ना…और तू हमेशा मेरे दिल में ज़िंदा है।”