राजीव वर्मा
कागज़ की कश्ती थी, पानी का किनारा था,
न कोई डर था, न कोई इशारा था।
हवा की लहरों संग सपने बह जाते थे,
हर बूँद में खुद को हम खोज पाते थे।
खेलने की मस्ती थी, ये दिल भी आवारा था,
हर पल में जादू, हर कोना हमारा था।
मिट्टी में सजे थे सपनों के महल,
ना कोई चिंता, ना कोई पहल।
पेड़ों पे झूलना, बादलों से बातें,
कभी छुपना धूप में, कभी बारिश की सौग़ातें।
हँसी की गूँज से गूंजता था आँगन,
ना मोबाइल, ना स्क्रीन — बस दिल से जीवन।
कहां आ गए इस समझदारी के दलदल में,
जहाँ हर मुस्कान तौलते हैं हलचल में।
अब खेल नहीं, बस दौड़ है मंज़िल की,
ख़ुशी भी गुम है इस भीड़ की सिलसिल में।
वो नादान बचपन भी कितना प्यारा था,
हर आँसू भी तब मुस्कान का सहारा था।
कभी गिरकर भी हँसना आता था,
हर हार में जीत का मज़ा पाता था।
कागज़ की कश्ती अब नहीं बनती,
वो नदी भी अब पास नहीं बहती।
पर यादों में अब भी वो लहरें उठती हैं,
जहाँ मासूमियत की धूप अब भी चमकती है।
काश फिर वही दिन लौट आते,
जहाँ दिल से हम दुनिया सजाते।
जहाँ नफरत नहीं, बस प्यार का सहारा था
कागज़ की कश्ती थी, पानी का किनारा था।