राजीव वर्मा
JE ने एस्टीमेट बनाया — बड़ी मेहनत से, मानो सड़क नहीं, कविता लिखी हो ‘सीमेंट और सिफारिश’ पर।
टेंडर पास हुआ — “योग्यता” देखकर नहीं, जेब की गहराई देखकर। ठेकेदार ने टेंडर लिया — और लिया आशीर्वाद भी, नोटों की माला पहनाकर। ऑफिसर को मिली रिश्वत — और नीति-नियमों ने वहीं दम तोड़ दिया।
फिर क्या था…ठेकेदार ने सड़क बनाई — जैसे बच्चे मिट्टी में लकीर खींचते हैं। तारकोल कम डाला, पर कमाई ज़्यादा निकाली। सड़क टूटी, गड्ढे बने — मानो धरती मां भी “खुलकर हँसी” हो उनके कारनामों पर।
अब एंट्री हुई ऑफिसर के बेटे की — नई बाईक, नया जोश, और सड़क पर पुराना धोखा।
पहिया गड्ढे में गिरा, सिर ज़मीन पर… और खेल खत्म। सड़क ने उसी को निगल लिया, जिसकी जेब से वो बनी थी।
हवन हुआ, मोमबत्तियाँ जलीं, लोग आए — कुछ रोने, कुछ दिखाने। पंडित जी बोले, “विधाता को यही मंजूर था।”
और ऑफिसर सोचने लगा —“अगर विधाता को मंजूर था, तो रिश्वत क्यों मंजूर थी मुझसे ?” पंडित जी को दक्षिणा मिली, ठेकेदार नए टेंडर की तैयारी में जुट गया, और विधाता फिर से बदनाम हुआ —क्योंकि इंसान को दोष देना अब आउटडेटेड हो गया है।
“सड़क फिर से बनेगी, बस ईमानदारी का गड्ढा अब कभी नहीं भरेगा।”