मन ही राम, मन ही रावण : एक विचारात्मक निबंध

राजीव वर्मा

आज २-अक्तूबर-२०२५ दशहरा पर्व पर विशेष लेख।

मानव जीवन में सबसे बड़ी शक्ति यदि किसी की है, तो वह है “मन”। मन ही वह साधन है जिसके सहारे मनुष्य देवत्व को प्राप्त कर सकता है और वही मन यदि विकारों में डूब जाए, तो राक्षस भी बन सकता है।

इसी सत्य को अभिव्यक्त करती पंक्तियाँ हैं –“मन हारा तो रावण है, मन जीता तो राम।”मन का द्वंद्वहमारे भीतर निरंतर देवासुर संग्राम चलता रहता है। यह संग्राम बाहर के शस्त्रों से नहीं, बल्कि विचारों और भावनाओं से होता है। जब मन में लोभ, मोह, क्रोध और अहंकार का उदय होता है, तब वही मन “रावण” बन जाता है। और जब मन संयम, त्याग, करुणा और धर्म की ओर अग्रसर होता है, तब वही “राम” के रूप में प्रकट होता है। इसीलिए संतों और ऋषियों ने कहा है कि सबसे बड़ा शत्रु बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर है।

मन ही कैकई, मन ही मंथरारामायण का उदाहरण देखें तो कैकई रानी और मंथरा दासी, दोनों का मूल कारण भी मन ही था।

मंथरा की कुंठा और कैकई का मोह, दोनों ने मिलकर राम को वनवास दिलाया। वास्तव में यह प्रसंग इस तथ्य को रेखांकित करता है कि यदि मन स्वार्थ और ईर्ष्या से भर जाए तो वह रिश्तों को भी कलुषित कर सकता है। यही कारण है कि मन को मैला होने से रोकना आवश्यक है, अन्यथा वही सत्यानाशी बन जाता है।

मन की अपार शक्तिमन का सकारात्मक रूप हमें अंगद और बजरंगबली की याद दिलाता है। अंगद ने अपने आत्मविश्वास के बल पर रावण की सभा में पाँव गाड़ दिए और कोई हिला न सका।

हनुमानजी ने अपने अडिग मनोबल से समुद्र लाँघा और लंका तक पहुँच गए। यह सब मन की शक्ति का परिचायक है। जब मन में श्रीराम का आश्रय हो, तो असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।अहंकार का अंतरावण जैसा ज्ञानी, शक्तिशाली और वीर भी अपने दंभी मन के कारण विनाश को प्राप्त हुआ। उसका अहंकार ही उसका सबसे बड़ा शत्रु था।

इसलिए कहा गया –“दंभी मन के रावण का जिस दिन होगा संहार,उस दिन जीवन में अवतरित होंगे श्रीराम।” आत्मनियंत्रण का महत्वमनुष्य के जीवन का वास्तविक लक्ष्य बाहरी शत्रुओं को जीतना नहीं, बल्कि अपने मन पर विजय प्राप्त करना है।

यदि मन को वश में कर लिया जाए तो जीवन सरल, शांत और सफल हो जाता है। योग और ध्यान इसी आत्मविजय की साधनाएँ हैं। मन जितना स्थिर और शुद्ध होगा, व्यक्ति का जीवन उतना ही उज्ज्वल होगा।

निष्कर्ष

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि मन ही मित्र है और मन ही शत्रु। यह राम भी बन सकता है और रावण भी। आवश्यकता केवल इसे साधने की है। यदि हम अपने मन को सकारात्मक दिशा दें, तो यह हमें उच्चतम शिखरों तक पहुँचा सकता है। परंतु यदि मन विकारों में डूब जाए, तो यही पतन का कारण बनता है। अतः जीवन का सबसे बड़ा साधना-पथ है – “मन जीतना”। क्योंकि सच है – मन जीता तो राम, मन हारा तो रावण।

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Rajeev Verma

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