राजीव वर्मा
निमंत्रण की ज़रूरत नहीं वहाँ जाने को,
ना ही बताने की कि कब लौट रहे हो।
कपड़े, चेहरा, मन का बोझ – कुछ मायने नहीं,
वो घर तो बस आपके आने को बना है।
दरवाज़ा सदा खुला, महक बचपन की सदा गगन में तैरती,
दो आँखें चौखट पर टिकी रहतीं—
बस ये सुनने को कि कोई आ रहा है।
वो घर… जहाँ आप लौटते हैं बिना लौटे हुए,
जहाँ खाना बिना माँगे परोसा जाता है,
जहाँ मना करने पर भी प्यारी डाँट मिलती है।
जहाँ आपकी चुप्पी समझ ली जाती है,
और आपके शब्द रत्नों की तरह संजोए जाते हैं।
वहाँ माँ की नज़र अब भी उतनी ही कोमल है,
वहाँ पापा अब भी मजबूत बनने का अभिनय करते हैं,
पर उनकी आँखें… सब कह देती हैं,
जब आपको चौखट पर खड़ा देखते हैं।
पर एक दिन—वो घर यूँ ही नहीं रहेगा।
उसके मालिक दरवाज़ा खोलने को नहीं होंगे,
और तब समझोगे कि घर दीवारों का नाम नहीं,
बल्कि दो दिलों की धड़कन का नाम है।
उस दिन, सारी दौलत, सारे महल, कुछ मायने नहीं रखेंगे।
आप बस यही चाहेंगे—एक और झलक,
एक और आलिंगन, एक और बार वो डाँट, वो मुस्कान।
इसलिए अगर आज भी वो घर आपका इंतज़ार कर रहा है,
तो देर मत कीजिए।
जाइए, गले लगिए, हँसिए, सुनिए,
कहानियों को दोहराइए, और माँ-पापा की आँखों में चमक भरिए।
क्योंकि माँ–पापा का घर शाश्वत नहीं है,
पर उनका दिया हुआ प्यार…आपके भीतर हमेशा जियेगा।