- राजीव वर्मा
थोड़ा ठहर जा ऐ ज़िंदगी,
ज़रा सांस तो लेने दे,
तेरी भागती दौड़ में उलझकर,
मुझे अपने आप से मिलने दे।
हर सुबह नई उम्मीदें लाती है,
हर शाम अधूरी थकान छोड़ जाती है,
तेरे सफ़र में बहुत कुछ पाया,
पर दिल अब भी सुकून को तरस जाता है।
तेरे इम्तिहान रोज़ नए होते हैं,
कभी आँसू, कभी मुस्कान से रोते हैं,
पर इस भीड़ में कहीं खो गया हूँ,
खुद की तलाश में अब भटक रहा हूँ।
ऐ ज़िंदगी, जरा रुककर तो देख,
मेरे सपनों का बोझ कम कर दे,
हर सवाल का कोई जवाब तो दे,
मेरे दिल की उलझनें साफ़ कर दे।
कभी तो सन्नाटा भी सुनने दे,
कभी तो ख़ुदा से जुड़ने दे,
कभी तो आईने में मैं दिखूँ,
कभी तो अपना सच जीने दे।
तेरे संघर्षों ने बहुत सिखाया है,
हौसले का मतलब समझाया है,
पर अब इक लम्हा चैन का भी चाहिए,
जहां दर्द नहीं, बस सुकून का साया है।
थोड़ा ठहर जा ऐ ज़िंदगी,
तेरी रफ़्तार बहुत तेज़ है,
मेरे अरमान अभी अधूरे हैं,
मेरे सफ़र के कुछ राज़ बाकी हैं।