राजीव वर्मा
अभी रूबरू भी नहीं हुआ मैं,
ए ज़िंदगी, तुझसे पूरी तरह।
आपाधापी और अंधी दौड़ की आंधी में,
तेरे असली लुत्फ़ को ढूंढता रहा,
पर न जाने क्यों तूदृश्य हो कर भी अदृश्य रही हर दफ़ा।
लोग कहते थे—ज़िंदगी एक अनमोल सफर है,
जिसमें ठहराव भी गीत है,
और रफ़्तार भी एक सुर।
मैंने धरती से पाताल तलक खोजा,
पर सुकून का नखलिस्तान कहीं न मिला।
अब समझ आता है,‘ठहर’ ही वो मंत्र था
जो जीने का सलीका सिखाता है।
पर पैरों की आदत है भागने की,
दिल की अदावत है न रुकने की।
रफ़्तार की हवाओं ने ठहराव की खुशबू छीन ली है।
चलो, अब थोड़ा मद्धिम हो लेते हैं,
तेज़ रफ्तार से मुक्ति पा लेते हैं।
ढूंढते हैं सुकून का नखलिस्तान,
जहां रूह को आराम मिले,
जहां हर साँस में अपनापन खिले।
वहीं के गिर्द आशियाना बना लेते हैं,
जहां सिर्फ़ हम और हमारी खामोशियाँ हों।
आह ज़िंदगी से अहा ज़िंदगी तक का सफर,
यूं ही तेरे संग तय करते हैं हम।
अब बाकी बचा हर लम्हा,
तेरी बाहों में सुकून ढूंढते हुए गुज़ारते हैं।