राजीव वर्मा
सन्नाटे में धड़कनों की धुन बना लेते हैं,
टूटे सपनों की राख से,
कुछ उम्मीदों के परचम जला लेते हैं।
आना ज़िंदगी, ओ ज़िंदगी…
साँसों के सूखे समंदर में थोड़ी नमी भर दो,
बिखरे रास्तों पर
किसी चिराग़ की लौ रख दो।
मेरे घर आना…
वो घर जो ईंट-पत्थर से नहीं बना,
वो घर जो मोहब्बत की मिट्टी से रचा,
जहाँ हर कोना दुआओं की खुशबू है,
जहाँ हर दीवार इंतज़ार में खड़ी है।
मेरे घर का छोटा सा इतना पता है
कि नक़्शे में दर्ज नहीं मिलेगा कहीं,
बस दिल की गलियों से गुज़रना,
और तन्हाई की चौखट पे ठहरना।
मेरे घर के आगे मोहब्बत लिखा है,
इबारत जो बारिश से भीगती नहीं,
जिसे आँधी मिटा नहीं सकती,
जिसे वक़्त की धूल ढँक नहीं सकती।
हैं दीवारें गुम, और छत भी नहीं है,
खुला है आसमान का हर टुकड़ा,
सितारों की चादर ओढ़ लेता हूँ रात में,
और चाँद को दिया बनाकर रख देता हूँ।
मेरे घर का दरवाज़ा कोई नहीं है…
तुम्हारी चाहत ही मेरी दस्तक बने,
तुम्हारा नाम ही मेरी चाबी हो,
और तुम्हारा होना ही मेरी हिफ़ाज़त।
तो…आना ज़िंदगी… ओ ज़िंदगी…
क्योंकि बिन तेरे ये ठिकाना अधूरा है,
तेरे बिना हर सुर बेसुरा है।
तू आएगी तो हवाओं में गुनगुनाहट होगी,
तू आएगी तो सन्नाटे में सरगम होगी।
अब तो गीत गुनगुना लेते हैं…
पर सच तो ये है कितू आए,
तभी ये गुनगुनाहट मुकम्मल होगी।