असम का अनोखा ‘तुलोनिया बिया’ उत्सव, जहाँ लड़की के पहले पीरियड को शादी जैसी धूमधाम से मनाया जाता है। जानें इसकी परंपरा और महत्व।

राजीव वर्मा

भारत की विविध संस्कृति में हर क्षेत्र की अपनी-अपनी परंपराएँ और अनोखी रीति-रिवाज हैं। असम राज्य में भी ऐसी ही एक अनोखी परंपरा देखने को मिलती है, जिसे “तुलोनिया बिया” कहा जाता है। यह उत्सव तब मनाया जाता है जब किसी लड़की को पहली बार माहवारी (पीरियड) आती है।

आमतौर पर भारत में पीरियड को लेकर समाज में चुप्पी और झिझक देखी जाती है, लेकिन असम की यह परंपरा इसे खुशी, सम्मान और उत्सव के रूप में मनाने का सुंदर उदाहरण है।

तुलोनिया बिया क्या है ?

“तुलोनिया बिया” असम का एक पारंपरिक उत्सव है, जिसमें लड़की के पहले पीरियड (Menarche) को शादी जैसा भव्य रूप देकर मनाया जाता है। यहाँ लड़की को दुल्हन की तरह सजाया जाता है, घर में मेहमान बुलाए जाते हैं और पूरा माहौल एक विवाह समारोह जैसा होता है।

यह परंपरा केवल उत्सव मनाने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह एक सामाजिक और शैक्षिक पहल भी है, जहाँ लड़की को महिला बनने की प्रक्रिया, प्रजनन स्वास्थ्य और आने वाली जिम्मेदारियों के बारे में सिखाया जाता है।

उत्सव की रस्में और विधि

तुलोनिया बिया की रस्में अलग-अलग क्षेत्रों में थोड़े बदलाव के साथ मनाई जाती हैं, लेकिन इसकी मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं:

1. लड़की को अलग कमरे में रखा जाता है। जब लड़की को पहली बार पीरियड आता है, तो उसे कुछ दिनों तक अलग रखा जाता है। इस दौरान उसे आराम करने और अपने शरीर में हो रहे बदलाव को समझने का समय दिया जाता है।

2. दुल्हन की तरह सजाना । खास दिन पर लड़की को पारंपरिक असमिया परिधान और गहनों से सजाया जाता है। उसे दुल्हन की तरह तैयार करके उत्सव में प्रस्तुत किया जाता है।

3. शादी जैसे आयोजन । घर में मेहमान, रिश्तेदार और पड़ोसी बुलाए जाते हैं।संगीत, नृत्य और दावत का आयोजन किया जाता है। लोग आशीर्वाद देते हैं और लड़की की नई यात्रा को खुशी से स्वीकार करते हैं।

4. शिक्षा और जागरूकता। इस मौके पर बड़ी महिलाएँ लड़की को पीरियड्स की देखभाल, स्वच्छता और जीवन में आने वाले बदलावों के बारे में सिखाती हैं। उसे एक जिम्मेदार और परिपक्व महिला बनने के लिए तैयार किया जाता है।

सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व

तुलोनिया बिया का महत्व केवल एक रस्म तक सीमित नहीं है। इसके पीछे गहरे सामाजिक संदेश छिपे हैं :

पीरियड को सम्मान देना – यह परंपरा बताती है कि माहवारी कोई शर्म की बात नहीं बल्कि गर्व और खुशी का विषय है।

महिला सशक्तिकरण – लड़की को केंद्र में रखकर उत्सव मनाना, उसे समाज में महत्व और सम्मान का अनुभव कराता है।

स्वास्थ्य शिक्षा – यह अवसर लड़कियों को मासिक धर्म और प्रजनन स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने का एक माध्यम बनता है।

परिवार और समाज की स्वीकार्यता – जब पूरा समाज इस बदलाव को खुले तौर पर मनाता है, तो झिझक और संकोच की जगह गर्व और आत्मविश्वास आता है।

आधुनिक संदर्भ में तुलोनिया बिया

आज भले ही शहरी जीवन में यह परंपरा कम देखने को मिलती है, लेकिन ग्रामीण और पारंपरिक असम में इसका महत्व अब भी बरकरार है। आधुनिक समय में इसे महिलाओं की स्वास्थ्य शिक्षा और जागरूकता से जोड़कर देखा जा रहा है।यह परंपरा हमें यह सिखाती है कि पीरियड को छिपाने या taboo मानने की बजाय, उसे जीवन का सामान्य और उत्सवपूर्ण हिस्सा मानना चाहिए।

अत: “तुलोनिया बिया” असम की एक अद्भुत और प्रेरणादायक परंपरा है, जहाँ लड़की के पहले पीरियड को किसी विवाह समारोह जैसी धूमधाम से मनाया जाता है। यह न केवल संस्कृति का हिस्सा है, बल्कि महिला सशक्तिकरण, स्वास्थ्य शिक्षा और सामाजिक जागरूकता का सुंदर प्रतीक भी है।

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Rajeev Verma

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