– राजीव वर्मा
बहुत समय बाद, जब हम यहाँ न होंगे,
फिर भी हमारी स्मृतियाँ हवा में तैरती रहेंगी।
हमारा प्रेम, जिसने दिलों पर अमिट छाप छोड़ी,
एक ऐसा रंग, जिसमें कोई बंधन नहीं,
बस भावनाओं का उफान,
अनियंत्रित, असीम, अनंत।
समय ने हमें इस स्थान से उठा लिया है,
मगर हम सचमुच कहीं खोए नहीं हैं।
हम बस ठहर गए हैं उस संध्या में,
जहाँ सूरज डूबते-डूबते
रात की चादर में घुलने लगता है।
जहाँ भोर की पहली किरण
अभी जन्म लेने को है,
पर रात का आलिंगन भी ढीला नहीं हुआ।
हम वहाँ हैं—
जहाँ न पूरा अंधेरा है, न पूरी रोशनी।
जहाँ यादें धुंध की तरह फैलती हैं,
और हर सांस में बीते दिनों की गंध है।
तुम अगर कभी चुपचाप आँखें मूँद लो,
तो हमें महसूस कर सकोगे—
तुम्हारी हथेलियों की गर्माहट में,
तेरे दिल की धड़कनों में,
तुम्हारे आँसुओं की नमी में।
हमारी हँसी की गूँज
अब भी हवा में बहती है,
जैसे पत्तों के बीच से
कोई पुराना गीत गुजर रहा हो।
हमारी बातों की सरगम
अब भी तट पर बैठी लहरों की तरह लौटती है,
हर बार थोड़ी और गहराई लेकर।
हाँ, समय हमें ले गया है,
पर हमें मिटा नहीं सका।
हम उस अमर आलोक में बस गए हैं,
जहाँ प्रेम का कोई अंत नहीं।
तो जब तुम अगली बार
सांझ और भोर के बीच ठहरो,
उस क्षणिक उषाकाल में,
जहाँ आकाश बैंगनी और सुनहरा हो जाता है,
याद रखना—
हम वहीं हैं,
तुम्हारे पास,
तुम्हारे हर सांस के साथ।