राजीव वर्मा
नदी की यादें…
सदियों पुरानी बातें…
बुज़ुर्गों की आवाज़…
गूंज रही है आज…
अक्सर बुज़ुर्ग कहते थे,”
नदी के पास घर मत बसाओ बेटा,
वो अपना रास्ता…
कभी नहीं भूलती…
“आज की पीढ़ी हँस के कहे,”
अब वो पुरानी बात है दादाजी,
अब तो रिवर-व्यू बिकते हैं,
लॉन में झूले, सेल्फ़ी कॉर्नर भी होते हैं जी!
पर नदी…
ना भूली, ना थमी, ना थकी,
बस बहती रही…
अपनी यादों के साथ,
अपनी ज़िद के साथ…
“मैं मालकिन हूँ इस घाटी की…”
हमने पत्थरों के गहने पहनाए,
रेत को सीमेंट से ढक डाला,
गूगल मैप से मिटा दिए रास्ते,
नाम दे दिए रिवर-व्यू, व्यास-व्यू…
फिर एक दिन…
घनघोर बारिश ने फाइलें खोलीं,
नदी आई…ना नाराज़, ना हिंसक…
बस कहने —
“मैं यहीं थी,तुम्हीं भूले हो जी…”
दीवारें टूटीं, छतें बहीं,
लोग चिल्लाए —
“सब लुट गया!”
सरकार को कोसा,
राजनीति गरमाई,
पर नदी बस मुस्कराई…
धीरे से बोली…
“मैं तो वही कर रही हूँ,
जो तुम्हारे बुज़ुर्ग बताते थे,
तुम्हीं थे जो भूल बैठे,
कि मैं मेहमान नहीं…
मालकिन हूँ इस घाटी की…
“अब भी वक़्त है,
सुन लो बात,
नदी को दुश्मन मत बनाओ,
वो जीवन है…
बशर्ते तुम…
मुझे बहने दो…
मुझे बहने दो…