डाक रनर

राजीव वर्मा

पहाड़ों की डाक और जज़्बे की कहानीपहाड़ों में डाक व्यवस्था का इतिहास जितना पुराना है, उतना ही संघर्षों से भरा हुआ भी। सड़कें पक्की बनने से पहले, पहाड़ी गाँवों और कस्बों को जोड़ने का एकमात्र जरिया हुआ करता था—डाक रनर। ये वो लोग थे जो पैदल ही घाटियों, जंगलों, नदी-नालों और खतरनाक चढ़ाइयों को पार करके डाक पहुँचाते थे।

कच्चे और पक्के पोस्ट ऑफिस का नेटवर्क

पहाड़ी इलाकों में बड़े कस्बों और बाज़ारों में पक्के पोस्ट ऑफिस होते थे। वहीं, दूर-दराज़ के गाँवों में कच्चे पोस्ट ऑफिस होते, जिन्हें प्रायः किसी स्थानीय दुकानदार, शिक्षक या ग्राम प्रधान द्वारा संचालित किया जाता। पक्के पोस्ट ऑफिस से कच्चे पोस्ट ऑफिस तक डाक पहुँचाने का ज़िम्मा होता था—डाक रनर पर।

डाक रनर का सफ़र

डाक रनर रोज़ाना तय समय पर अपनी यात्रा शुरू करते। उनके पास एक लकड़ी या लोहे का डाक बॉक्स होता, जिसे वे कंधे पर टांगकर चलते।सुबह-सुबह पक्के पोस्ट ऑफिस से डाक लेतेघाटियों, जंगलों और पगडंडियों से होते हुए कच्चे पोस्ट ऑफिस तक पहुँचतेवहाँ से वापस लौटते हुए दूसरी जगह की डाक लेकर आतेबरसात हो, बर्फ़बारी हो, या तेज़ धूप—इनका सफ़र कभी नहीं रुकता। पहाड़ों में कई बार नदियाँ उफान पर होतीं, तो इन्हें पानी में उतरकर पार करना पड़ता। सर्दियों में बर्फ़ और बर्फ़ीली हवाओं से जूझते हुए भी ये लोग समय पर डाक पहुँचाते।

खतरा और जिम्मेदारी

डाक रनर का काम केवल पैदल चलना नहीं था—यह जान जोखिम में डालने जैसा था।जंगली जानवरों का डर (भालू, तेंदुआ, जंगली सुअर)फिसलन भरी पगडंडियाँतेज़ बहाव वाली नदियाँअचानक बदलता मौसमफिर भी, ये लोग डाक को समय पर पहुँचाना अपनी जिम्मेदारी मानते थे।

सिर्फ पत्र नहीं, उम्मीदें भी

डाक रनर सिर्फ खत और पार्सल ही नहीं लाते थे—वे गाँव वालों के लिए उम्मीदें, खुशखबरियाँ, और कभी-कभी दुखभरी खबरें भी लेकर आते थे।किसी बेटे का विदेश से भेजा खतशादी का निमंत्रणपरीक्षा का रिज़ल्टसरकारी सूचनामनी ऑर्डर की रकमगाँव वाले डाक रनर को दूर से आता देख पहचान लेते और बेसब्री से इंतज़ार करते।

पहाड़ों में डाक बॉक्स की परंपरा

पहले गाँवों में लाल रंग के लोहे के डाक बॉक्स होते थे। लोग अपने खत उसमें डाल देते और डाक रनर उन्हें निकालकर साथ ले जाता। कई बार किसी छोटे गाँव में डाक बॉक्स के पास कोई बुज़ुर्ग बैठा मिलता, जो आने-जाने वालों को चाय-पानी भी पिलाता।

समय के साथ बदलाव

सड़कें बनने लगीं, मोटरसाइकिल और जीप से डाक पहुँचने लगी। मोबाइल और इंटरनेट के आने से खत लिखने की परंपरा भी कम होती गई। आज डाक रनर की संख्या बहुत कम रह गई है, लेकिन जो अभी भी इस काम में हैं, वे पहाड़ की डाक व्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं।

सम्मान और स्मृति

डाक रनर केवल एक कर्मचारी नहीं, बल्कि पहाड़ की आत्मा का हिस्सा हैं। उन्होंने दशकों तक अपनी मेहनत और ईमानदारी से पहाड़ों को जोड़े रखा।आज भी कई बुज़ुर्ग उनके किस्से सुनाते हैं—कैसे एक डाक रनर बर्फ़ीले तूफ़ान में भी डाक लेकर पहुँचा, या कैसे किसी बीमार को दवा दिलाने में मदद की।

डाक रनर पहाड़ों के सच्चे नायक हैं—जिन्होंने बिना किसी आधुनिक सुविधा के, केवल अपने पैरों की ताकत और कर्तव्य भावना से डाक और दिलों को जोड़े रखा। ये सिर्फ डाक नहीं, बल्कि रिश्तों और उम्मीदों के संदेशवाहक थे।

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Rajeev Verma

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