राजीव वर्मा
मुझ पर दोस्तों का प्यार,
यूँ ही उधार रहने दो,बड़ा हसीन है, ये कर्ज,
मुझे कर्ज़दार रहने दो
हर मुलाक़ात में एक जादू है,
हर हँसी में उनकी बातों की खुशबू है,
उनके बिना ये जिंदगी, जैसे अधूरी कहानी,
इस किताब-ए-ज़िंदगी को यूँ ही ख़ुमार रहने दो।
वो आँखें जो छलकती हैं,
ग़म में, ख़ुशी में, मेरे लिए,
उन सभी आँखों में सदा,
प्यार बेशुमार रहने दो
कभी आँसू बनके बहती हैं,
कभी दुआ बनके कहती हैं,
उन आँखों के हर एक मोती में,
छुपा है एक रिश्ता बेमिसाल।
उन निगाहों का नूर,
मेरे जीवन का उजास बन जाने दो।
मौसम लाख बदलते रहें,
आएँ भले बसंत-पतझड़,
मेरे यारों को जीवन भर,
यूँ ही सदाबहार रहने दो
कभी बरसात की फुहारों में भीगते,
कभी सर्दियों की चाय में घुलते,
वो संग चलना हर राह पर,
हर मोड़ पर नाम हमारा एक साथ रहने दो।
कभी मनमुटाव, कभी मनुहार,
पर दिलों में ना हो दीवार,
दोस्ती का ये संगीत,
हर मौसम में बहार रहने दो।
महज दोस्ती नहीं ये,
बगिया है विश्वास की,प्यार, स्नेह के फूलों से,
इसे गुलज़ार रहने दो
हर रिश्ता तोलता है कुछ पाने में,
पर दोस्ती बस होती है निभाने में,
इस बगिया की माटी मेंना कोई स्वार्थ उगे, ना शिकवा।
बस भरोसे के फूल खिलें,
और अपनापन हर डाली पर झूमता रहे।
वो मस्ती, वो शरारतें,
न तुम भूलों, न हम भूलें,
उम्र बढ़ती है..
खूब बढ़े,जवाँ ये किरदार रहने दो
कभी क्लास में खामोश हँसी,
कभी कैंटीन की अधूरी चाय,
वो कॉपी में छिपे हुए राज़,
वो बिना कहे समझ जाना…
वो ‘चल यार, कहीं चलते हैं’,
बस यूँ ही हर दास्ताँ मेंहमेशा जिंदा रहने दो।
उम्र की राहों में भले ही रफ्तार आ जाए,
पर दिलों का मिज़ाज बचपन सा रह जाए,
हम सब बुज़ुर्ग हों कल भले,
पर हमारी दोस्ती को हर रोज़ का त्योहार रहने दो।
अंत में बस इतना ही कहूँगा:
“जो रिश्ते दिल से बनते हैं,
वो वक़्त के साथ टूटते नहीं,
बस उन रिश्तों में, थोड़ा सा प्यार,थोड़ा सा समर्पण, और
थोड़ी सी यादें रहने दो…”