राजीव वर्मा , 20- जुलाई -2025
हम हैं कान…
जी हाँ वही…
जो चुपचाप सब सुनते हैं,
लेकिन खुद कभी सुने नहीं जाते
हम दो हैं – जुड़वां भाई
लेफ्टू और राइटू ..
लेकिन किस्मत ने ऐसा झपट्टा मारा है…
कि अब तक एक-दूसरे की शक्ल तक नहीं देखी
(Zoom मीटिंग तक नहीं हुई भाई!)
लगता है पैदा होते ही
कोई तांत्रिक श्राप मिला था
जाओ बच्चो,
ज़िंदगी भर उल्टी दिशा में टंगे रहो!
अब देखो सीन क्या है…
हमें सिर्फ़ “सुनने” का डिपार्टमेंट मिला है…
गालियाँ हों या बीवी की चिल्लाहट,
प्यारी बात हो या बॉस की बकवास
सबका हम ही
ऑडियो रिकार्डर’ हैं !
धीरे-धीरे हमें खूंटी समझ लिया गया ..
ऊपर से चश्मा लटकाओ,
मास्क अटकाओ, एयरफोन ठूसो,
गुटखा फँसाओ, बाल काटो –
सब काम हमसे ही
अबे चश्मा आँखों के लिए है ना,
तो हम पे क्यों लटकाते हो यार?
हम कोई hanger हैं क्या ? !
हमारी किस्मत में दर्द ही दर्द है…
बचपन में दिमाग न चले तो
टीचर हमारी झिंझोड़ी करते थे!
मास्टर जी –
कान खींच दूँगा!
(जैसे खींचने से ब्रेन चालू हो जाएगा
फिर जवानी आई –लौंग, बाली, झुमका, हूप्स…
सब हमारे ऊपर टेस्ट किया गया!
छेद हमारे हुए, और तारीफ – चेहरे की
अरे भैया, बोरवेल हमने झेला,क्रेडिट कोई और ले गया!—
कभी देखा है कानों के लिए कोई फेयरनेस क्रीम?
नहीं ना…!!
आँखों को काजल,
होठों को लिपस्टिक,
गालों को ब्लश…
कानों को – धक्का और कट !!!
और कोई कवि या शायर
हमारे लिए भी दो लाइनें लिखता है क्या ?
नहीं भाई!
उन्हें तो बस आँखें, होठ, जुल्फें …
यही सब रोमांटिक लगता है
हम तो जैसे किसी प्लेट में
बची हुई दो सूखी पूड़ियाँ हैं …
जो बस चेहरा फुल दिखे
इसलिए चिपका दी गईं !
और बाल काटते वक्त जो
काट हमारे ऊपर चलता है,
वो अलग ही दुखद कहानी है …
फिर डिटॉल लगाकर हमें बहलाया जाता है –
चुप हो जा शेरू, थोड़ा सा ही कटा है …
अब तो मास्क वाला युग आ गया है …
मास्क भी हमीं पर टांग दिया !
मतलब हम नहीं,
कोई सरकारी खूंटी हैं क्या ? !
हम न रो सकते हैं,
न बोल सकते हैं …
बस चुपचाप लटके हैं …
जो भी आ जाए, हुक दो भाई कान पर !
लेकिन एक बात है …
हम मजबूती से टंगे हैं,
हर हाल में –
मुस्कुराते हैं, गुनगुनाते हैं …
और सब कुछ सुन जाते हैं
तो अगली बार जब मास्क लगाओ,
चश्मा लटकाओ या झुमका पहनो …
हम कानों को थैंक यू बोल देना …
हम भी इंसान हैं यार
थोड़े सेंसिटिव हैं !
हँसते रहिए –
और कानों को सलाम ठोंकिए !
कान है तो कान्फिडेंस है!