राजीव वर्मा
हे रम प्रेमी ग़ालिब के भाई,
तेरे हाथों में है जाम की मलाई।
साकी से तूने गिलासिया भरवाई,
पर दिल की धड़कन तूने कब समझाई?
शराबी महफ़िल में तू शेर सुना,
पर जो पी, वो दर्द भी खुद चुना।
बात ये नहीं कि जाम कितना था भारी,
बात ये है, दिल में छुपी थी लाचारी।
तो ध्यान खुद के कलेजे का रखना,
मुर्ग खा, पर जला उसका कलेजा, ध्यान रखना।
न शौक़ में दिल जला, न तंदूर बना,
शराब में नहीं, ज़िंदगी में भी कुछ रंग जमा।
रहना नदी नालों से तू दूर,
वहीं पे बसी हैं हूरों की हूर।
पर याद रख, ये हूरें सिर्फ़ बातों की हैं,
हक़ीक़त में वो झीलें काली रातों की हैं।
कहीं साकी की बातों में न आ जाना,
कहीं भीगे हुए ख़्वाबों में बह जाना।
जो शबाब दे, वो शबखून भी मार सकता है,
और जो जाम दे, वो ज़हर भी पिला सकता है।
कोई साकी जेब कतर न ले,
तेरी औक़ात और इज़्ज़त उधार न ले।
पैमाना बस इतना ही ले,
कि होश रहे, और दुनिया भी दिखे।
जश्न में हो मगर ज़मीर साथ हो,
बातों में न सही, निगाहों में बात हो।
सिगरेट का धुआं नहीं, सच्चाई जले,
तेरे लफ़्ज़ों से कोई मयकशी चले।
हे ग़ालिब के हमदर्द, तू भी शायर है,
तेरी क़लम में भी इश्क़ का ज़हर है।
पर मदहोशी में अपनी राहें न गुमा,
कभी जाम रख, कभी कलम भी उठा।
इस शेर के साथ करूं ख़त्म मैं बात —
“रख हद में जाम, वरना खुद को भूल जाएगा,
जो दिल से निकली, वही बात फिर जाम में डूब जाएगी।”