राजीव वर्मा
ये जो न्यामत मिली,
ये जो साँसें चल रही,
ये धड़कनों की लय,
जैसे वीणा बज रही।
हर सवेरा सुनहरा,
हर निशा में नूर है,
मेरे जीवन की गागर में,
उसका ही भरपूर है।
करूं ईश्वर का शुक्र,
हर लम्हा हर बात पर,
उसी की छाया में हूँ,
उसी के प्रभात पर।
वो ही करते दुःख कफ़ूर,
देते सुख-संसार,
हर संकट में वो बन जाते,
मेरा सबसे बड़ा आधार।
न्याय विन्यास भरपूर,
है उसकी ये रचना,
हर रेखा में उसका लिखा,
भाग्य की रचना।
कभी आंसू, कभी मुस्कान,
दोनों का है मेल,
ईश्वर की लीला अनोखी,
अद्भुत उसका खेल।
मैं जब गिरा, उसने थामा;
जब टूटा, जोड़ा मुझे,
हर बार जब खोया खुद को,
फिर से जोड़ा मुझे।
ये जो न्यामत मिली,
सिर्फ़ उसकी ही मेहर है,
मैं हूँ धूल, वो मूरत;
मैं राह, वो रहबर है।
तू ही धरती, तू ही अम्बर,
तू ही मेरा देव,
तेरे बिना सब अधूरा,
जीवन एक सन्देह।
शब्द भी कम पड़ जाते हैं,
गुण गाने के लिए,
तू ही हर प्रेरणा मेरी,
जीने के लिए।
शुक्र है तेरे हर न्याय का,
तेरे विधान का,
तेरी कृपा से ही टिका हूँ,
अपने आत्म-सम्मान का।
वो ही करते दुःख कफूर,
वो ही देते राह,अंधकार में दीप बनें,
जब ना कोई हो साथ।
भटकूं तो पकड़ ले तू,
थकूं तो विश्राम दे,
भूल जाऊं तुझको,
फिर भी अपना नाम दे।
तेरा न्याय अपार,
तेरी कृपा असीम,
तू ना होता साथ तो,
अधूरी होती थी ये ज़िंदगी की टीम।
ये जो न्यामत मिली,
क्या बताऊँ कैसे पाई,
हर मोड़ पर तू दिखा,
जब दुनिया ने परछाई।
शब्दों में ना बंध पाए तू,
भावों का सागर है,
तेरी ही सदा से ही तो,
जीवन मेरा नगर है।
करूं ईश्वर का शुक्र,
अब हर साँस में तेरा नाम,
तेरे चरणों में शांति है,
तेरे दर्शन में आराम।
जो भी हूँ, तुझसे हूँ;
जो भी पाऊँ, तेरा दान,
तेरा न्याय, तेरा विन्यास —
मेरा सबसे बड़ा सम्मान।
वो ही करते दुःख कफ़ूर,
तेरा प्रेम ही संजीवनी,
तू ही मेरा सारथी,
तू ही मेरी जीवनी।