सिंहासन खाली करो,
के जनता आती है,
न्याय की अग्नि सी धधकती,
वेदी सजाती है।
जिसने भूखे पेट भी सपनों को पाला है,
अब वो जागा है,
अब वो संभाला है।
कितनी रातें बीतीं बिन चूल्हा जलाए,
कितनी आँखों ने देखे ताज के साए।
अब वो आँसू नहीं,
अंगार बन चुके हैं,
हर सवालों के जबाव तलवार बन चुके हैं।
कह दो उन महलों में बैठे दरबारियों से,
कह दो नकली क्रांति के प्रचारियों से।
अब नकाब नहीं,
चेहरों को पहचाना जाएगा,
हर गद्दार,
हर जालिम को जाना जाएगा।
झूठ की चादर जितनी भी बुन लो,
सच की रोशनी से फट ही जाएगी।
जनता की हुंकार अगर उठती है कहीं,
तो हर सत्ता की नींव हिल जाएगी।
तुमने छीन लिया रोटी से निवाला,
और सोने के बिस्तर पर चैन से डाला।
पर अब नहीं, अब हक़ मांगा नहीं जाएगा,
अब हर कर्ज़ ब्याज समेत वसूला जाएगा।
ये भीड़ नहीं, ये जनसमूह है,
जिसे ना रोक सके कोई बंदूक है।
ना धर्म का बहाना,
ना जात की दीवार,
अब सब पर भारी पड़ेगा जनता का विचार।
गांव से शहर तक,
हर कोना बोलेगा,
अब हर पत्थर से इंकलाब डोलेगा।
कुर्सी से चिपके रहोगे कब तक ?
जनता के सैलाब में टिकोगे अब तक ?
हर नारे में आग है,
हर नजर में सवाल,
हर कदम चल रहा है एक नई मिसाल।
ये समय की मांग है,
ये क्रांति की घड़ी है,
हर दिशा से गूंज रही जनता की चिट्ठी है।
तो सुन लो ऐ शासकों,
अब नहीं चलेगी चालें फरेब की,
अब चलेगी कलम की,
अब चलेगी क्रांति की।
अब सिंहासन खाली करो,
कि जनता आती है —
हक़ लेकर, इज़्ज़त लेकर,
क्रांति की बाती है।
– राजीव वर्मा