Rajeev verma
पलकों की हद लांघ कर,
दामन पे आ गिरा,
एक अश्क मेरे सब्र की
तौहीन कर गया।
बरसों से दिल में जो तूफ़ान छुपाए बैठा था,
हर दर्द को हँसी की चादर से ढाँपे बैठा था।
टूटी थी साँसे, बिखरी थी नींदें,
फिर भी हर रोज़ खुद को समेटे बैठा था।
हर बात पे मुस्कुराया,
हर घाव छुपा लिया,
किसी को खबर न हो
ऐसा चेहरा बना लिया।
मगर उस दिन…
जब वो नाम लिया किसी और का,
और नज़रें चुरा लीं मेरे सवालों से,
तो दिल की उस मीनार से
एक ईंट सरक गई…
सालों से जो अश्क पलकों की कैद में था,
वो आज़ाद हो गया,
दामन पे गिर कर
मेरे सब्र की तौहीन कर गया।
वो सिर्फ़ एक आँसू नहीं था,
वो मेरी ख़ामोशी की चिट्ठी थी,
जिसमें लिखा था —
“मैं भी थक चुका हूँ, अब और नहीं…”
वो पल…
जब दिल चीख़ना चाहता था,
मगर आवाज़ भी दग़ा दे गई,
बस एक कतरा बोल गया,
और सब्र मेरी नज़रें छोड़ गया।
अब क्या फर्क पड़ता है
किसे खबर है, क्या बीता है?
लोग तो बस यही पूछते हैं –
“क्यों उदास हो आजकल?”
और मैं मुस्कुरा कर कहता हूँ –
“कुछ नहीं… बस नींद पूरी नहीं हो रही…”
लेकिन सच्चाई ये है कि
नींद अब आती ही नहीं,
और अगर आती है तो
तेरे ख्वाब में खो जाती है।
वो एक अश्क…
अब हर रोज़ पलकों पे दस्तक देता है,
हर रोज़ बताता है —
कि सब्र का भी एक आख़िरी किनारा होता है।