पलकों की हद लांघ करदामन पे आ गिरा,
एक अश्क मेरे सब्र कीतौहीन कर गया।
मैंने तो सीना ज़ख़्मों सेसदियों तक ढांपा था,
हर दर्द को मुस्कान मेंधीरे-धीरे बाँधा था।
लब खामोश थे, पर दिलहर रात तड़पता रहा,
हर सुबह उम्मीद काइक दिया जलता रहा।
न शिकवा किया, न फ़रियाद,
बस खुद से ही जंग लड़ी,
हर आँधी में खुद कोएक चट्टान सा खड़ा रखा।
मगर आज ये क्या हुआ,वो एक लम्हा,
वो एक बात,जिसने दिल के तहख़ानों से
बोल उठाया हर जज़्बात।
वो अश्क जो कभीजज़्ब था पलकों की क़ैद में,
किसी बेबसी की साजिश मेंबग़ावत कर गया।
वो गिरा दामन पे ऐसेजैसे सौ बातें कह गया,
हर चुप्पी की कहानी कोइक लफ्ज़ में पढ़ गया।
सब्र की जो मीनार थी,वो इक कतरे से ढह गई,
वो अश्क नहीं बस,मेरे सब्र की तौहीन कर गया।
अब दिल की ज़मीन परखामोशी की बारिश है,
हर याद एक बिजली बनकरसन्नाटों में गूंजती है।
मैं फिर भी मुस्कुराता हूँ,टूट कर भी निभाता हूँ,
मगर अब वो भरोसाकहीं गुम हो गया है शायद।
अब जब कोई पूछता है —”कैसे हो?”
तो बस मुस्कुरा कर कह देता हूँ —”ठीक हूँ,
जैसे पहले था…”
– राजीव वर्मा