राजीव वर्मा, स्वरचित एवं प्रकाशित 6-मई-2025
एक ऐसा शब्द है जिसमें संपूर्ण सृष्टि का सार समाया हुआ है। वह अपने बच्चों के लिए सब कुछ छोड़ सकती है, लेकिन अपने बच्चों को कभी नहीं छोड़ सकती। माँ जिस बेटे के साथ रहती है, उसी के भले के लिए अधिक सोचती है, उसी के बच्चों से अधिक मोह रखती है। यह कोई पक्षपात नहीं, बल्कि एक साधारण स्त्री का स्वाभाविक भाव है, जो उसी आँगन को अपना मानती है जिसमें वह रहती है।
हमें माँ के इस स्वभाव से नाराज नहीं होना चाहिए, क्योंकि माँ पहले एक स्त्री है। जब वह किसी घर का हिस्सा बनती है, तो अपने पूरे अस्तित्व को वहीं समर्पित कर देती है। वह उसी को अपना सब कुछ समझने लगती है – उसकी खुशियाँ, उसका दुःख, और उसका भविष्य।परंतु यह मत भूलो कि वह तुम्हारी माँ भी है। वह तुमसे भी उतना ही प्यार करती है, जितना वह उस बेटे से करती है जिसके साथ वह रहती है। फर्क सिर्फ इतना है कि उसकी उपस्थिति एक जगह केंद्रित हो जाती है। माँ का मन बहुत कोमल होता है। तुम उससे प्यार करो, उसकी परवाह करो, उसके स्वास्थ्य का ध्यान रखो। माँ की सेवा करना केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि सौभाग्य है।
अपने मातृ ऋण को चुकाना हर संतान का धर्म है। माँ ने तुम्हारे लिए कितनी रातें जागी होंगी, कितनी बार तुम्हारे दर्द में तड़पी होगी। याद रखो, अगर तुम्हें कुछ हो जाए तो उसकी नींद उड़ जाती है, उसका दिल बेचैन हो उठता है। माँ का यह रिश्ता निस्वार्थ होता है, जिसमें केवल देना होता है, लेना कुछ नहीं।
माँ के मन को समझो। अगर वह कहीं और ज्यादा जुड़ी हुई लगती है तो इसका मतलब यह नहीं कि उसने तुम्हें कम प्यार किया। यह उसका वह तरीका है जिससे वह अपने आप को जीवन के बचे हुए वर्षों में ढालती है। तुम्हें चाहिए कि तुम उसका सहारा बनो, न कि उलाहना दो।आखिर तुम भी उसी का अंश हो। उसके अस्तित्व का हिस्सा। उसका साया जब तक तुम्हारे सिर पर है, तब तक तुम्हारी दुनिया सुरक्षित है। माँ के प्रेम की कोई तुलना नहीं हो सकती। इसलिए, उसे समझो, उसके साथ समय बिताओ, और उसे यह अहसास दिलाओ कि वह केवल एक माँ नहीं, बल्कि तुम्हारे जीवन की सबसे महत्वपूर्ण स्त्री है।