साइलेंट डिवोर्स

राजीव वर्मा स्वरचित एवं प्रकाशित 24-अप्रैल-2025

साइलेंट डिवोर्स उस बढ़ते हुए रूझान को दर्शाता है जिसमें युगल कानूनी रूप से तो विवाहित बने रहते हैं, लेकिन भावनात्मक और व्यवहारिक रूप से अलग हो जाते हैं।

पारंपरिक तलाक

—जिसमें कानूनी कागजी कार्रवाई, अदालत और सार्वजनिक घोषणा शामिल होती है

—तलाक की जगह यह मौन प्रक्रिया चुपचाप चलती है।

इस लेख में साइलेंट डिवोर्स के मुख्य कारण, वर्तमान रुझान और इसके व्यक्तिगत एवं सामाजिक प्रभावों पर चर्चा की जा रही है।

1. साइलेंट डिवोर्स के मुख्य कारण

1.1 भावनात्मक दूरी

समय के साथ, दंपति आपस में भावनात्मक रूप से अलग हो सकते हैं—काम का तनाव, बच्चों की जिम्मेदारियाँ या अनसुलझे झगड़े अंतर बढ़ा देते हैं। फिर जब संबंध सुधारने के प्रयास विफल होते हैं, तो जुड़ाव की बजाय चुप्पी को चुना जाता है।

1.2 औपचारिक अलगाव का भय

कानूनी तलाक की सामाजिक कलंक, महंगा वकील खर्च, या बच्चों पर असर से कुछ लोग डरते हैं। इस वजह से वे दिखावे के लिए शादी को बनाए रखते हुए वास्तविक रूप से अलग जीवन जीते हैं।

1.3 तकनीक का प्रभाव

सोशल मीडिया, मैसेजिंग ऐप और स्ट्रीमिंग सर्विसेज ने व्यक्तिगत डिजिटल दुनिया बना दी है। पति-पत्नी अपने-अपने ऑनलाइन स्पेस में व्यस्त रहते हैं और एक-दूसरे से संवाद कम हो जाता है, जिससे भावनात्मक दूरी और बढ़ जाती है।

1.4 सामाजिक मानदंडों में बदलाव

साथ रहने (cohabitation) और गैर-पारंपरिक रिश्तों की स्वीकृति बढ़ी है। इससे शादी की बंधनशीलता कम दिखती है और जोड़े अपने-अपने शर्तों पर संबंध परिभाषित करते हैं—even if that means emotional separation.

2. सामाजिक और जनसांख्यिक रुझान

2.1 दीर्घायु में वृद्धि और लंबी शादी

लोग लंबे समय तक जी रहे हैं और औसतन शादी कई दशकों तक टिक रही है। शुरुआती जोश के बाद, अगर जोड़े समय-समय पर जुड़ाव न बनाएँ तो वर्षों बाद चुप्पी छा सकती है।

2.2 दंपति में दोनों के कामकाजी होने की दर

दोनों साथी पूर्णकालिक कामकाजी होते हैं, जिससे एक साथ बिताया गया गुणवत्ता समय कम मिलता है। व्यस्त शेड्यूल के चलते संबंध की देखभाल के बजाय अलग-अलग जीवन जीना आसान हो जाता है।

2.3 मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता

मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान बढ़ा है, और टॉक्सिक रिश्तों से बचने के लिए कुछ लोग संघर्ष की जगह खुद को बचाने हेतु दूर क्यों न हो जाएँ, यह चुनते हैं।

2.4 महामारी के बाद का असर

COVID‑19 ने आर्थिक अनिश्चितता, बच्चों की पढ़ाई और स्वास्थ्य चिंताओं के बीच तनाव बढ़ाया। वहीं काउंसलिंग या सामाजिक मदद भी सीमित हो गई, जिससे तनाव लंबे समय तक घर पर ही जमा रहा।

3. व्यवहारिक और मनोवैज्ञानिक पहलू

3.1 अवॉयडेंस और टकराव-असहिष्णुता

जोड़े खुलकर अपनी समस्याएँ साझा नहीं करते और टकराव से बचते हैं। बिना संवाद के अरूचि और कटुता जमा होती जाती है।

3.2 पहचान और स्वतंत्रता

आधुनिक समय में आत्म-साक्षात्कार का महत्व बढ़ा है। कई बार व्यक्तिगत विकास के प्रयास में व्यक्ति शादी से अलग एक ‘स्व’ खोजने लगता है।

3.3 बच्चों और परिवार पर प्रभाव

घर में मौन दूरी का प्रभाव बच्चे महसूस करते हैं—उन्हें भ्रम, चिंता या आंतरिक द्वंद्व हो सकता है। विस्तारित परिवार भी इस चुप्पी से अनजान रहते हैं, जिससे बच्चों को बाहरी सहयोग नहीं मिलता।

4. समाधान और प्रतिक्रिया

4.1 खुला संवाद प्रोत्साहित करना

ईमानदार, सहानुभूतिपूर्ण बातचीत रिश्ते को बचाए रख सकती है। कपल थेरपी—ऑनलाइन या ऑफलाइन—संरचित माहौल देती है।

4.2 नियमित “चेक‑इन”

समय-समय पर “हमारे संबंध का हाल” चर्चा के लिए समय निर्धारित करना उन मुद्दों को सामने लाता है जो चुप्पी से पहले सुलझ सकते हैं।

4.3 तकनीक का सकारात्मक उपयोग

जोड़े साझा कैलेंडर, कृतज्ञता जर्नल या गाइडेड ऐप्स का उपयोग करके डिजिटल रूप से जुड़ाव बढ़ा सकते हैं।

4.4 संबंधी संक्रमणों को सामान्य मानना

रिश्ते में बदलाव स्वीकार करने से शर्मिंदगी घटती है। साइलेंट डिवोर्स को अंत नहीं, बल्कि चेतावनी समझकर जोड़े सक्रिय कदम उठा सकते हैं।

साइलेंट डिवोर्स आधूनिक दंपतियों के जीवन में गूढ़ रूप से उभरता रुझान है। इसके कारण भावनात्मक, तकनीकी, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक हैं। जबकि पारंपरिक तलाक की दर स्थिर या घटती दिख रही है, चुप्पी से अलगाव बढ़ सकता है। इस पर काबू पाने के लिए खुला संवाद, नियमित देखभाल और बदलावों के प्रति स्वीकार्यता जरूरी है। इससे जोड़ों को या तो अपने संबंध को पुनर्जीवित करने का अवसर मिलता है, या अलगाव को स्वस्थ रूप से स्वीकारने की क्षमता और मौन दूरी का जाल टूटता है।

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Rajeev Verma

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