राजीव वर्मा, स्वरचित 17-अपैल-2025
बीस साल पहले, जब मैंने भारत छोड़ा था, मेरी आँखों में बड़े सपने थे। न्यूयॉर्क की चकाचौंध, डॉलर की चमक और एक बेहतरीन करियर का ख्वाब मुझे वहाँ खींच ले गया। शुरूआत में सब कुछ नया और रोमांचक था — ऊँची-ऊँची इमारतें, सटीक टाइम पर चलती मेट्रो, और हर तरफ़ एक प्रोफेशनल माहौल।
मैंने मास्टर्स की, फिर एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी लग गई। पैसों की कमी नहीं थी। हर वीकेंड कहीं न कहीं घूमना, दोस्तों के साथ पार्टी करना और साल में एक बार यूरोप ट्रिप — ये सब मेरी ज़िंदगी का हिस्सा बन गया था। लेकिन फिर भी, कुछ अधूरा था।
समय के साथ समझ आया कि ये चमक-धमक भी एक दिन पुरानी लगने लगती है। हर चीज़ की एक कीमत होती है — यहाँ रिश्ते प्रोफेशनल होते हैं, त्यौहार छुट्टी के दिन बनकर रह जाते हैं, और ज़िंदगी एक रूटीन में बँध जाती है। माँ-बाप की तबीयत खराब रहने लगी, वीडियो कॉल पर उनका चेहरा दिन-ब-दिन कमज़ोर होता गया। और तब पहली बार लगा — मैं क्या खो रहा हूँ।
फिर एक दिन, ऑफिस से लौटते हुए, मैंने खुद से पूछा — “क्या यही मेरी मंज़िल है?” उस रात मैं देर तक नहीं सो पाया। अगले दिन मैंने अपनी जॉब से छुट्टी ली और एक टिकट बुक किया — भारत की ओर।भारत लौटा तो बहुत कुछ बदल चुका था, लेकिन कुछ चीज़ें वैसी ही थीं — माँ के हाथ का खाना, पापा की चाय पर होने वाली बातचीत, बचपन के दोस्त और मोहल्ले की गर्माहट। मैंने तय किया कि अब यहीं रहूँगा।
अब मैं एक स्टार्टअप चला रहा हूँ — एक ऐसा प्लेटफॉर्म जो NRI और भारतीय युवाओं को एक-दूसरे से जोड़ता है। मैं अब पैसा शायद पहले जितना नहीं कमा रहा, लेकिन हर सुबह जब सूरज की किरणें खिड़की से अंदर आती हैं और माँ की आवाज़ सुनाई देती है — तो लगता है, सही फैसला लिया।
क्यों लौटा? क्योंकि ज़िंदगी सिर्फ करियर से नहीं, रिश्तों से भी बनती है। क्योंकि घर सिर्फ एक जगह नहीं, एक एहसास होता है और क्योंकि कभी-कभी, वापस लौटना आगे बढ़ने का सबसे सही रास्ता होता है।