राजीव वर्मा, स्वरचित 16- अप्रैल-2025
“पहली बार खुद की क़दर जानी …
“पहली बार जब बिस्तर पर पड़ी,
तब समझ आया
—क़ीमत क्या होती है किसी की।
झाड़ू-पोछा, बर्तन-कपड़े,
हर काम की कीमत हज़ारों में गिनी जाती थी।
खाना—चार हज़ार, ड्रेसिंग—तीन हज़ार,
और सुबह की चाय संग नाश्ता—उफ़ !
क्या-क्या लिखूं, कहाँ तक गिनूं?
दस हज़ार देकर भी नहीं मिली जो बात,
घर में कोई बाई टिकती ही नहीं,
और मैं … बरसों से टिकी हूँ,
बिना सैलरी के ही रुकी हूँ।
बीस साल की सेवा,
लाखों में तौली जा सकती है शायद।
वो कहते रहे—”कमाती नहीं हो”,
पर कमाया नहीं, बचाया तो है!
मकान को घर बनाया,
सपनों से सजाया,मान लिया
—तुम्हारा किया बहुत है,
पर मेरा किया क्या कम था?
ये घर संभालना मेरा शौक़ नहीं,
ज़रूरत थी, जिम्मेदारी थी,
तुम बाहर लड़ते रहे दुनिया से,
मैं अंदर दीवारों से,
तन्हाई से, खुद से।
काश तुम समझ पाते,
मेरे किए को हल्का ना बताते,
मुझे एक पहचान मिलती,
सिर्फ़ “घरवाली” नहीं
— एक इंसान समझा जाता।
अब जब थक गई हूँ,
तो खुद की क़दर आई नजर,
क्योंकि मैं थी,
घर भी था, और
ये सुकून भी था।