राजीव वर्मा
बीस बरस पहले जब मैं अमरीका गया था, तो पिताजी ने स्टेशन पर मुझे सख़्त हाथों से गले लगाया था। उन्होंने हमेशा की तरह कुछ नहीं कहा, पर उस दिन उनकी हथेली थोड़ी देर तक मेरे कंधे पर टिकी रही। माँ बार-बार आँचल से आँखें पोंछ रही थीं।
मैंने पलट कर देखा था—पिताजी की आँखें लाल थीं, लेकिन आँसू नहीं थे। शायद वो मुझे मज़बूत बनाना चाहते थे।
मुझे आज भी याद है, जब मैं चौथी कक्षा में गणित में फेल हुआ था, तो पूरे मोहल्ले के सामने उन्होंने मुझे डाँटा था। लेकिन उसी रात चुपचाप मेरे लिए लाल रंग की नई कॉपी और पेंसिलें लाए थे, और बोले थे—”बेटा, जो गिरता है, वही आगे चलना सीखता है।”
वो हमेशा सख़्त दिखे, पर उनका प्यार बहुत गहरा था—उस पुराने रेडियो की तरह, जो धीमे-धीमे बोलता था, लेकिन बहुत कुछ कह जाता था।
मैं न्यू यॉर्क पहुँचा, तो लगा जैसे ज़िंदगी ने नए सिरे से जन्म लिया हो। वहाँ सब कुछ तेज़ था—लोग, ट्रैफिक, वक्त। शुरुआत में रेस्ट्रॉन्ट में वेटर की नौकरी की। रात की शिफ्ट में काम करके सुबह लैब में पढ़ाई करता था।
एक बार बर्फ़बारी में जूते फट गए थे, पैर जम चुके थे, लेकिन छुट्टी नहीं ली—क्योंकि एक घंटे की तनख्वाह से अगले हफ्ते का खाना जुड़ा था। हर बार जब थक जाता, तो पापा की कही एक बात याद आती—”हर सच्ची मेहनत का फल ज़रूर मिलता है, भले देर से मिले।” उनकी यह बात जैसे मेरी रीढ़ बन गई थी।वक़्त बीतता गया…फिर नौकरी मिली, फिर प्रमोशन हुआ। पैसे आने लगे, पर समय कम होता गया।
कई बार पिताजी फोन पर कहते—”अब तो छुट्टी मिलती होगी, कभी आ जा।” मैं हँसकर कहता—”पापा, अगली बार पक्का।” और वो जवाब देते—”ठीक है बेटा, ध्यान रखना।” उनके शब्द कम होते जा रहे थे, और मेरी व्यस्तता बढ़ती जा रही थी।
एक दिन माँ का फोन आया—”तेरे पापा अब ज्यादा दिन के नहीं रहे।” मैंने टिकट देखा, लेकिन उसी हफ्ते कंपनी में मीटिंग थी। सोचा, एक हफ्ता और…पर पापा ने नहीं सोचा। वो चले गए।
अब जब मैं लौटा, तो सब कुछ बदल चुका था। घर में बस खामोशी है, और उनकी कुर्सी पर पड़ी एक पुरानी चादर। उस चादर में शायद अब भी उनकी गंध बची है।
मैं हर सुबह उनके फोटो के सामने बैठता हूँ, और मन ही मन कहता हूँ—”पापा, माफ़ करना… मैं समय पर नहीं लौट पाया। लेकिन आप हर पल मेरे साथ थे। आज जो भी हूँ, आपकी ही बदौलत हूँ।