पहली बार खुद की क़दर जानी,
जब बिस्तर पे आके नज़र जानी।
झाड़ू, बर्तन, खाना, सफ़ाई,
हर बात की अपनी क़दर जानी।
दस हज़ार दे कर भी ना मिलती,
वो मेहनत जो हर रोज़ कर जानी।
कोई बाई टिक ना सकी घर में,
मैं थी जो बरसों से ठहर जानी।
बिन सैलरी के जो निभाई थीं,
ज़िम्मेदारियाँ उम्र भर जानी।
बीस साल में जो बचाया है,
वो दौलत नहीं, पर असर जानी।
कहते रहे – “कुछ कमाती नहीं”,
मैंने चुप रह के हुनर जानी।
मकान को घर तो बनाया है,
जिसमें हर दीवार से डर जानी।
तुम्हारा किया भी है सर आँखों,
मगर मेरा क्या यूँ ही मर जानी?
ना था शौक़ मुझे सँवारने का,
ये ज़रूरत थी, मैं मगर जानी।
काश समझ पाते मेरा होना,
मेरे काम की भी खबर जानी।
अब जो थक कर चुप सी बैठी हूँ,
तो सबने मेरी भी नज़र जानी।
– राजीव वर्मा