राजीव वर्मा, स्वरचित एवं प्रकाशित
तीन problems बहुत बढ़ रही हैं,
समाज की गुत्थियाँ उलझ रही हैं।
पहली – आदमी के पास काम नहीं है,
सपनों की बस्ती में शाम नहीं है।
रोज़गार की तलाश में भटकता वो जाए,
आस का दीपक धीरे-धीरे बुझ जाए।
दूसरी – काम के लिए आदमी नहीं मिल रहे हैं,
खेत-खलिहान सूने, कारखाने ठहर रहे हैं।
काबिलियत की परख में कौन पास आए,
श्रम का सूरज धुंध में छिप जाए।
तीसरी – काम के लिए रखे हुए आदमी किसी काम के नहीं हैं,
दफ़्तरों में बैठे, सपनों के जाल बुन रहे हैं।
वक़्त की कीमत को कौन पहचाने,
मेहनत की दौलत यूं ही बेगानी रह जाए।
इन तीनों समस्याओं का हल कौन लाए,
श्रम और हुनर को कौन अपनाए?
जब हर हाथ को मेहनत का मान मिलेगा,
तभी नया भारत साकार बनेगा।