राजीव वर्मा, स्वरचित एवं प्रकाशित
हे नीरज, गीतों के सागर,
शब्दों के तुम मधुर सुवास हो अमर।
प्रेम के स्वर में गूँजी जो बांसुरी,
तेरे गीतों में बसा हर जन का सफर।
हे मुद्राराक्षस, विद्रोही विचार,
सत्ता के सम्मुख सदा तना श्रृंगार।
कलम की धार से लिखी जो बात,
वो बनी समाज की नई सौगात।
हे नामवर, आलोचना के दीप,
शब्दों में गूँजता ज्ञान का संगीत।
साहित्य की थाती के ध्वजवाहक,
तुम्हारे लेखन में सत्य की प्रीत।
हे अज्ञेय, रहस्य के राही,
कविता में रचा जीवन का प्रवाही।
मन के गहन अंधेरों में जो झांका,
हर शब्द बना चेतना का झरोखा।
हे अटल, वाणी के वीर,
राजनीति में गूँजते कवि के शेर।
शब्दों में ओज, हृदय में संवेदना,
तुमसे मिली वतन को नई चेतना।
तुम सबने लिखे जो अमिट नाम,
शब्दों के ये दीप जलाते पैगाम।
हे नीरज, हे मुद्राराक्षस, हे नामवर, हे अज्ञेय, हे अटल…
तुम्हें सलाम है, तुम्हें सलाम है।