राजीव वर्मा द्वारा स्वरचित
जब भी कभी ठोकर खाता हूं,
अपने पापों को याद कर सिहर जाता हूं,
बीत गए जो लम्हे साए बन जाते,
रातों में खामोशियां चीख कर बुलाते।
सताते हैं भूत पापों के,
हर सांस में बसते हैं,
परछाइयां सी घेरे रहती हैं,
ख्वाबों में डर रचते हैं।
गुज़रा जो वक्त लौट के आया,
आंखों में जैसे कोई दर्द समाया,
दस्तक देते हैं दरवाज़ों पे,
जख्म पुराने फिर से जागे।
भूत पापों के,
ना छोड़ें मेरा पीछा,
दिल के वीराने में बसा उनका डेरा,
जब रात गहराने लगती है,
सन्नाटे की आवाज़ भी डराती है।
क्यों लम्हों की गलती की ये सजा है?
रूह तक कांपती हर सदा है,
गुनाहों के साए संग चलते हैं,
रात की चादर में छुप के जलते हैं।
काश के माफ कर दे खुदा मुझे,
दिल के आईने से मिटा दे धुंधले निशां,
सवेरा आए तो बह जाए गुनाह,
रोशनी से भर जाए ये बंजर जहां।
जब भी कभी ठोकर खाता हूं,
अपने पापों को याद कर सिहर जाता हूं,
मगर उम्मीद की लौ जलती रहे,
शायद कल कोई नयी सुबह कहे… 🎶🙏