राजीव वर्मा स्वरचित एवं प्रकाशित 28 -फरवरी-2025
एक सच, जो हम सब जानते हैं लेकिन स्वीकारने से कतराते हैं। मनुष्य समाजिक प्राणी है और समाज में अपनी अलग-अलग भूमिकाएं निभाता है। हर व्यक्ति अपने जीवन में कई किरदार निभाता है – पति, पत्नी, माता-पिता, दोस्त, कर्मचारी, भाई या बहन। इन सभी भूमिकाओं के साथ एक अदृश्य मास्क जुड़ा होता है, जो व्यक्ति परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहता है।
रिश्तों के अनुसार चेहरा
पति-पत्नी के सामने व्यक्ति अपने स्नेह और देखभाल का मुखौटा पहनता है, जबकि माता-पिता के सामने वह आज्ञाकारी और संस्कारी संतान बन जाता है। बच्चों के सामने एक जिम्मेदार और आदर्श माता-पिता का चेहरा दिखाता है, तो दोस्तों के सामने वह हल्का-फुल्का और हंसी-मजाक वाला चेहरा पहन लेता है।
कार्यस्थल पर अलग व्यक्तित्व
ऑफिस में वही व्यक्ति अनुशासनप्रिय, मेहनती और गंभीर नजर आता है। यहां उसकी प्राथमिकता अपने पेशेवर जीवन को बेहतर बनाना होता है, भले ही उसका निजी जीवन कितना ही उलझा हुआ क्यों न हो।
असली चेहरा कहां है ?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कोई व्यक्ति अपने असली रूप में किसी के सामने आता है ? शायद खुद के सामने भी नहीं। हर व्यक्ति के भीतर एक दुनिया है, जहां उसकी असली भावनाएं, डर, सपने और दुख छुपे होते हैं।
सच है कि हर व्यक्ति मास्क पहने रखता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह छल कर रहा है। ये मास्क समाज की अपेक्षाओं और रिश्तों की मर्यादा को बनाए रखने के लिए जरूरी हैं। असली सुंदरता इसी में है कि हर चेहरे के पीछे का इंसान समझने की कोशिश की जाए और उसे बिना किसी मुखौटे के स्वीकार किया जाए।