धनखर्च

राजीव वर्मा, वर्ष 2007 में स्वरचित व प्रकाशित

धन कमाना कठिन नहीं होता है परन्तु उसे सही प्रकार से खर्च करना एक कला है। धन खर्च करना आ जाये तो थोड़े धन से भी मनुष्य सुखी हो सकता है। जब तक किसी प्रकार का संकट न हो और परिस्थितियां अनुकूल हों, तब तक प्रत्येक मनुष्य को सीधे अपने ध्येय पर चलते हुए आत्म निर्माण के कार्यों में व्यस्त रहना चाहिए।

यदि कोई आकस्मिक आपत्ति उठ खड़ी हो तो उस मार्ग का अनुकरण करना चाहिए जिसमें परिवार का हित सर्वप्रमुख हो। परिवार के आदर्श जीवित रहेंगे तो व्यक्तिगत उत्थान की परिस्थितियों भी अनुकूल होंगी भले ही उनमें बहुत सा समय लगे। यदि परिवार धर्म ही नष्ट हुआ तो अपने आपको नष्ट हुआ समझना चाहिए।

परिवार की रक्षा और उसके स्वाभिमान को जीवित रखने के लिए जितना कुछ बन पड़े, सहयोग देते रहना चाहिए। जिस परिवार का मुखिया कर्जा लेने का शौकीन होता है वह अपने परिवार का सबसे बड़ा दुश्मन होता है।

व्यक्ति और समाज दोनों ही धन करज की चपेट में आ जाते हैं। इसलिए हम जिस स्थिति में हैं, अपने जीवन को उसी अवस्था में उसी स्थिति में दूसरों के सामने रखें, इसी में अपनी और समाज की भलाई सन्निहित है।

मनुष्य जब तक अपनी सही सच्ची स्थिति में बना रहता है तब तक अनेक प्रकार की मुसीबतों से बचा रहता है। किन्तु जैसे ही मिथ्या, आडंबर और स्वयं को बढ़ा-चढ़ाकर प्रदर्शित करने की प्रवृत्ति उसमें विकसित होती दिखाई पड़े तो समझ जाना चाहिए कि दुर्दिन निकट हैं।

यह एक बहुत बड़ा अवगुण है कि कोई अपनी शक्ति के बाहर और स्थिति के बिलकुल प्रतिकूल खर्च करे। इससे लाभ तो कुछ होता नहीं परन्तु हां, महत्वकांक्षा की पूर्ति अवश्य हो जाती है कि लोग उन्हें अमीर समझें और बड़ा आदमी मानें। इस भ्रम में पड़कर ऐसे व्यक्ति धन की बर्बादी तो करते ही हैं, मन को भी इन्हीं भ्रम जालों में उलझाए रखते हैं।

परिणाम यह होता है कि जिस ऊर्जा को विकास योजनाओं में लगाना चाहिए, वह बाह्य आडंबर जैसे तुच्छ कार्य की उधेड़बुन में पड़कर नष्ट हो जाती हैं। व्यक्ति पतन पराभव की दिशा में लगातार चला जाता है।

बाहरी सज-धज को जो मान प्रतिष्ठा का आधार मानते हैं, वे वस्तुत: भ्रम में रहते हैं। आज की ग़लती का परिणाम सारे जीवन भर भोगना पड़ता है। इस दिशा में ध्यान योग्य बात यह है कि जिस धन का अपव्यय प्रदर्शन जैसे कार्य के लिए किया जा रहा है, उससे वैयक्तिक और सामाजिक अनेक प्रकार के कार्य किए जा सकते हैं, पर दिखावे में लगकर वह धन यों ही बर्बाद हो जाता है। विवेकवान पुरुष बाहरी वेश विन्यास और वस्त्राभूषणों के आधार पर लोगों का मूल्यांकन नहीं करते, वरन् वे इसके लिए आंतरिक गुणों को मापदंड मानते हैं।

मनुष्य की शिष्टता और शालीनता उसकी सादगी में झलकती है, न कि बाहरी दिखावे में। सदाचरण और सादगी का परस्पर घनिष्ठ संबंध होता है। जहां सादगी होती है वहीं सत्कर्म होंगे, वहां सुख और सुव्यवस्था भी होगी। मनुष्य के लिए यही स्थिति अभीष्ट भी है। अतः आडंबर की तुच्छ प्रवृत्ति में न पड़कर हर एक को सीधे सादे ढ़ंग से रहने में ही अपनी शान और बड़प्पन समझना चाहिए। गरीब होना पाप नहीं है, किन्तु जब येन केन प्रकारेण गरीबी छिपाकर अमीरी का आवरण ओढ़ने का प्रयत्न किया जाता है, तो गरीबी तो ज्यों कि त्यों बनी रहती है और अन्य मुसीबतें भी उठ खड़ी होती हैं ।

अपनी वास्तविक स्थिति में अंत तक बिना दिखावे के साथ बने रहना मनुष्य का नैतिक बल प्रदर्शित करता है। संभव है आज की परिस्थिति में मन में इसके लिए कुछ झिझक और संकोच उत्पन्न हो, किन्तु एक सी स्थिति में सुखी और संतुष्ट जीवन बिताने के लिए यह सर्वश्रेष्ठ मार्ग है कि अपनी स्थिति पर और स्तर का अतिक्रमण न हो। निर्धनता का उपहास कुछ दिन हो सकता है, मगर झूठा प्रदर्शन तो संपूर्ण जीवन को प्रभावित करता है और वास्तविक स्थिति को और भी दयनीय बना देता है।

झूठ जब तक बोलने चालने तक सीमित हो, तब तक उससे विषेश हानि की संभावना नहीं रहती, किन्तु योजनाबद्ध ढंग से झुठाई के परिणाम असाधारण होते हैं। धन कर्ज एक पाप ही नहीं महापाप है।

रोटी न पेट में हो तो फिर कुछ जतन न हो,

मेले की सैर, ख्वाहिश -बागों-चमन न हो,

भूखे गरीब दिल की खुदा से लगन न हो,

सच ही कहा किसी ने भूखे पेट भजन न हो,

अल्लाह की भी याद दिलाती हैं रोटियां।

मनुष्य के लिए जैसे अन्न, जल, वायु की आवश्यकता है, वैसे ही धन की आवश्यकता है।

कृपया सुझाव एवं विचार अवश्य प्रस्तुत करें।

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Rajeev Verma

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