कंजूस नहीं मित्तव्ययी बनें

राजीव वर्मा, वर्ष 2011 में स्वरचित व प्रकाशित

आय सीमित है और परिवार की आवश्यकताएं अनेक हैं, फिर भी प्रत्येक परिवार अपनी आय से अधिकतम संतुष्टि चाहता है। आज के संघर्षमय जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है कि इस बजट व्यय व्यवस्था को व्यवहार रुप प्रदान किया जाए तथा ऐसे नियोजित ढंग से आय को खर्च किया जाय कि व्यय आय की सीमा में रहे।

“तेते पांव पसारिए, जेती लांबी सौर” अर्थात् व्यक्ति को अपनी आय के अन्दर खर्च करना चाहिए। पारिवारिक बजट परिवार के आय व्यय का एक अनुमान है अथवा निश्चित अवधि के लिए आय व्यय के पूर्वानुमान को बजट कहते हैं। पैसे का नियम है कि हाथ में आते ही व्यय होने लगते हैं।

छिपी हुई कृत्रिम आवश्यकताएं प्रलोभन और विलासिता की वस्तुऐं खरीदने को मन करता है। हमारे समाज में आय के अनुपात में एक हैसियत है, एक स्थिति है। यदि हम इस हैसियत के अनुसार व्यय नहीं करेंगे और आवेश, मिथ्या प्रदर्शन या फजूलखर्ची में अधिक व्यय डालते हैं, तो यह निश्चय है कि हमारा जीवन सदा मिथ्या भार से दबा रहेगा और विकास रुक जायेगा।

भारत में केवल धनी वर्ग को ही नहीं अपितु साधारण स्थिति वालों तथा निम्न वर्ग के लोगों में भी अपव्यय तथा मिथ्या प्रदर्शन की भावनाएं हैं जो दूसरों के सम्मुख अपना अतिरंजित एवं झूठा स्वरुप रखना चाहते हैं।

मिथ्या प्रदर्शन के अनेक रुप हैं, जैसे :-

* मित्रो में प्रतिष्ठा रखने हेतु अपव्यय।

* विवाह, त्यौहारों एवं जनम मरण संस्कारों में व्यर्थ खर्च।

* दान दहेज, चंदा, इत्यादि में अपनी आय की अपेक्षा अधिक व्यय।

* चटकीली भड़कीली पोशाक में व्यय।

* सिगरेट, चाय, शराब, सट्टा, जुआ, सिनेमा, व्याभिचार, इत्यादि के वश में आकर विभिन्न प्रकार के भोग विलासों में फिजूलखर्ची।

जो व्यक्ति जितना कम जानता है उतना ही अविवेकी और नासमझ है और वह उतना ही बाह्य प्रदर्शन करता है। मिथ्या प्रदर्शन की भावना मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से थोथेपन, संकुचितता, उथलेपन और छिछोरेपन की प्रतिक्रिया है।

पैसों की मितव्ययिता और सावधानी से व्यय करने से प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है। जो आमदनी हो उससे कम व्यय कीजिए और थोड़ा थोड़ा भावी आवश्यकताओं के लिए अवश्य बचाते चलिए।

रहन सहन ऊंचा करने के लिए संयम और इंद्रिय निग्रह चाहिए। दूसरा तत्व शिक्षा है। सद्बुद्धि और अर्थशास्त्र की शिक्षा से वे कृत्रिम आवश्यकताओं से बच सकेंगे। यदि वे अपनी शक्तियों का विकास करें, अच्छे आदमियों के रहन सहन का अनुकरण करें तो अच्छी तरह रह सकते हैं।

पहले जीवनरक्षक पदार्थ खरीदें, फिर निपुणतादायक पदार्थों का अधिक उपयोग करें और अंत में आराम के लिए पदार्थों का उपयोग कर सकते हैं। हम एक बजट की रुपरेखा पर विचार कर सकते हैं जोकि इस प्रकार हो सकती है :-

१. भोजन पर व्यय २५%

2. वस्त्र पर व्यय 10%

3. मकान किराया/सुधार रख रखाव पर व्यय 20%

4. बचत पर व्यय 15%

5. आत्मसुधार पर व्यय 10%

6. आकस्मिक व्यय 15%

7. मनोरंजन पर व्यय 5%

उपर्युक्त बजट से हम इन निष्कर्षों पर पहुंच सकते हैं :-

१. जिन परिवारों की आमदनी कम है वे जीवन निर्वाह की वस्तुओं पर अधिक खर्च करते हैं।

२. वस्त्रों पर मजदूर तथा निम्न श्रेणी के अलावा मध्य और सम्पन्न परिवार लगभग एक जैसा ही खर्च करते हैं।

३. मकान किराया में गरीबों को कुछ लाभ रहता है।

४. अधिक आमदनी वाले प्रायः शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन, परिचया , इत्यादि में ज्यादा खर्च करते हैं।

५. नमन श्रेणी के व्यक्ति प्रायः मादक वस्तुओं में बहुत व्यय कर डालते हैं।

जिसके पास बचा हुआ पैसा जमा नहीं है, वह कभी सुख की नींद नहीं सो सकता। चाहे थोड़ी ही सही, बचत के मद में कुछ न कुछ अवश्य रखना समझदारी है। बचत को सदैव नगद रुपयों के रुप में ही रखना चाहिए।

चाहे एक समय भूखे रहें किंतु कुछ न कुछ अवश्य बचाकर रखना चाहिए। त्योहार, श्राद्ध, शादी विवाह, दान, यात्राएं, धर्मादाएं, आभूषण, इत्यादि पर कम से कम करने के लिए प्रस्तुत रहना चाहिए।

साधारण गृहस्थी के खर्च के लिए तीन लंबे लिफाफे और उन पर लिखिए :-

१. चालू खर्च का रुपया।

२. अचानक खर्च का रुपया।

३. प्रासंगिक खर्च तथा बचत का रुपया।

उपरोक्त तीन लिफाफे की बचत प्रणाली मेरे वरिष्ठ सहयोगी द्वारा अपनाई गई, जो सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इन लिफाफों में अपनी आमदनी के हिसाब से पृथक पृथक रुपया डालिए। संकट के समय में आमदनी कम हो तब अपने खर्च कम करने के लिए प्रस्तुत रहिए। अपनी आदत बनाना आपके हाथ की बात है।

आइये हम निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखें :-

१. सबसे पहले अपने मनोरंजन के व्यय को कम करिए।

२. रद्दी कागजों को व्यर्थ मत फेंकिए।

३. मद्यपान, गुटखा, शराब, फैशन, सिगरेट की कमी कीजिए। घर में खाली जमीन है तो उसमें शाक सब्जी लगाइए, शारीरिक श्रम के साथ पैसा भी बचेगा।

४. बच्चों को ट्यूशन न भेजकर खुद पढ़ाएं।

५. जल्दी सोइये व जल्दी जागें, स्वास्थ्यप्रद है।

६. चाय छानने के बाद में बची हुई पत्तियां संग्रह कर सुखा लें। उनका काढ़ा निकाल कर फर्नीचर पर पालिश करने से पूर्व सफाई के काम ले सकते हैं।

७. संतरे के छिलके को व्यर्थ न फेंकिए। उन्हें धूप में सुखाकर महीन चूर्ण तैयार कर विभिन्न व्यंजनों में खुशबू के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं।

८. बीमार होने पर अपने आप नीम हकीम की दवाई न लेकर अच्छे डाक्टर से परामर्श लें। पैसा बचेगा और लंबी बिमारी से बचेंगे।

९. यदि वस्तुओं की मरम्मत करानी है तो यथासमय तुरन्त करा लेना उचित है। वस्तुएं तथा बिमार मनुष्य खराब होते ही सहानुभूति की अपेक्षा करते हैं। यदि आप अल्पकाल के लिए भी रुकेंगे तो यह हानि परिपुष्ट होकर अधिक व्यय और चिंतन की अपेक्षा करेगी।

१०. कपड़ा धोने के साबुन को रोज सुखा लीजिए। सूखा हुआ साबुन अपेक्षाकृत कम घिसता है।

११. स्नान के साबुन का अंतिम शेष बचा हुआ भाग नये साबुन पर चिपका लीजिए।

१२. कपड़ा धोने के साबुन के छोटे टुकड़ों को एक डिब्बे में रखिए और उसी में पानी डालकर उन्हें घोल लीजिए, उससे कपड़े धोये जा सकते हैं।

१३. वाशिंग मशीन का उपयोग किया पानी फेंकिए मत, इससे फर्श धोए जा सकतें हैं।

१४. दियासलाई के सींकों को तीक्ष्ण रेजर ब्लेड के द्वारा मध्य से चीर लीजिए। दियासलाई दोगुनी हो जाएगी।

हम प्रत्येक दिन दो प्रकार के खर्चों का सामना करते हैं :-

१. चालू व्यय

२. अचानक व्यय।

चालू व्यय प्रति मास करना होता है। इसमें कमी नहीं हो सकती।  इसमें भोजन का बजट, मकान का व्यय, जैसे बिजली, पानी, मरम्मत या किराया का व्यय, बच्चों की स्कूल फीस, नौकरों का खर्चा, वस्त्रों पर व्यय, धोबी, पेट्रोल, बीमा पालिसी, दूध, साबुन, पेस्ट, चाय, गैस, इत्यादि।

अचानक व्यय के अंतर्गत दैनिक स्थायी व्यय के अतिरिक्त कुछ ऐसी बातें भी है जिनमें मनुष्य को व्यय करना होता है। वे खर्च अचानक मनुष्य पर टूट पड़ते हैं। यदि हमारे पास इस मद में रुपया न हो तो कर्ज की नौबत आ सकती है। इस मद में होने वाले खर्च हैं – बिमारी, अचानक मेहमानदारी, अचानक कहीं जाना पड़े, यात्रा का खर्च, कोई अनय आपत्ति, जैसे मुकदमेबाजी, या किसी को कर्ज देना पड़े या किसी की मृत्यु हो जाये, मकान गिर पड़े, घर में चोरी हो जाए, इत्यादि अनिश्चितता पर व्यय। इसके अतिरिक्त जीवन की अनेक दुर्घटनाएं हैं जिनके लिए आपको रुपयों की जरुरत पड़ सकती है।

अंत में राय यह है कि पारिवारिक व्यय करते समय सब खर्चों का खूब अनुमान लगा लीजिए। जो स्थाई व्यय हैं, उन्हें महिने के प्रारंभ में कर डालिए। भोजन और स्थाई  खर्च प्रारंभ में कर लेने से महिने के अंत तक आनंद रहता है।

त्योहार व उत्सव में आत्मनिग्रह और संयम आपकी सहायता करेंगे। तीर्थयात्रा, विवाह, ब्राह्मण भोज, बिरादरी को प्रसन्न करने में व्यय करना छोड़ दीजिए। इसी प्रकार अतिथि सेवा आपका धर्म है पर कर्ज लेकर मेहमानदारी करना एक मूर्खता है। बाहरी टिप टाप से बचें। मितव्ययी बनें, कंजूस नहीं।

कृपया सुझाव एवं विचार अवश्य प्रस्तुत करें।

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Rajeev Verma

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