तनाव प्रबंधन

राजीव वर्मा, वर्ष 2001में स्वरचित व प्रकाशित

गायत्री मंत्र का नौवां अक्षर “भ” हमको प्रत्येक स्थिति में मानसिक भावों को संतुलित रखने की शिक्षा देता है :-

भवो द्विग्न मना चैव ह्रदुद्वेगं परित्यज । 

कुरु सर्वा स्वव स्थासु शान्तं संतुलितं मन:  ।।

अथार्त, मानसिक उत्तेजनाओं को छोड़ दो। सभी अवस्थाओं में मन को शांत और संतुलित रखो।

हमारे जीवन की गुणवत्ता हमारी मनोस्थिति से निर्धारित होती है। यदि हम अपने मन की ओर ध्यान दें तो पायेंगे कि वह या तो अतीत में उलझा रहता है या फिर भविष्य के प्रति चिंतित रहता है। जब मन भविष्य में भटकता है तो आशंका, भय और अनिश्चितता हमें घेरे रहती है। आने वाले कल में क्या होगा, कैसे होगा, होगा कि नहीं, इत्यादि। मन अतीत और भविष्य के बीच जितना अधिक झूलता है उतना ही अधिक दबाव हमारे स्नायु तंत्र पर बढ़ता जाता है, जिसके फलस्वरूप हम शारीरिक बिमारियों या मानसिक तनाव के शिकार हो जाते हैं।

भगवान बुद्ध ने “मन्झम मग्न” अर्थात् मध्यम मार्ग का आचरण करने के लिए सर्वसाधारण को उपदेश दिया है। बहुत तेज दौड़ने वाले जल्दी थक जाते हैं और बहुत धीरे धीरे चलने वाले अभीष्ट लक्ष्य तक पहुंचने में पिछड़ जाते हैं। जो मधय गति से चलता है वह बिना थके, बिना पिछड़े, उचित स्थान पर अपने गन्तव्य स्थान तक पहुंच जाता है।

मन की क्रियाओं को तीन भागों में विभाजिन किया जाता है :-

१. भावना – जो ह्रदय से उत्पन्न होती है।

२. विचार – जो बुद्धी से उत्पन्न होता है।

३. क्रियाएं – जो कार्य हम इनके उत्पन्न होने से करते हैं।

ऐसे बहुत कम व्यक्ति हैं जिनमें इन तीनों क्रियाओं का पूर्ण सामंजस्य होता है। जिनमें इन तीनों ही तत्वों का पूर्ण सामंजस्य होता है ऐसा व्यक्ति मानसिक दृष्टि से पूर्ण स्वस्थ होता है।

यदि हमको संसार में तनाव मुक्त रहना है, तो सदैव उन विकारों को नियंत्रण में रखना आवश्यक है जो हमारी गुणवत्ता संतुलन को नष्ट करके, हमको एकांगी बनाकर, हमारे कार्य को पतन की ओर अग्रसर करते हैं।

यदि हम जीवन की गुणवत्ता के नियमों पर आचरण करेंगे तो तनाव के दिन और विपरीत घटनाएं सहज ही निकल जायेंगे। ऐसे अवसर पर मानसिक संतुलन स्थिर रखना और शांति और दृढ़ता से विघ्न बाधाओं का प्रतिकार करना ही हमारे लिए सर्वाधिक हितकारी होता है।

हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि मानसिक असंतुलन गुणवत्ता की असफलता का मूल कारण है। मानसिक असंतुलन की दशा में कोई व्यक्ति न तो सांसारिक उन्नति कर सकता है, न ही कार्यालय में अपना कार्य ठीक प्रकार से कर सकता है। क्यों न हम दिनचर्या का प्रबंधन कुछ इस प्रकार करें कि हमें किसी भी कार्य के लिए न अधीर होना पड़े और न ही उतावलापन दिखाना पड़े।

आइये जीवन की गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए हम तनाव प्रबंधन के कुछ नुस्खों पर ध्यान दें :- 

१. सुबह सोकर उठने का समय निर्धारित करें। प्रण करें आज का विजेता मैं रहूंगा। ईश्वर का ध्यान करें। घूमने जायें। योगाभ्यास इत्यादि करें। अखबार पढ़ें।  वर्तमान से जुड़े रहें ताकि आत्मविश्वास में वृद्धि हो।

२. जीवन की गुणवत्ता प्रणाली के खिलाफ जाने की बजाय इसके अनुकूल बनें। मन में धारणा करें – मैं जीवन में सफलता चाहता हूं, मैं सफलता प्राप्त करके ही रहूंगा क्योंकि मैं सफलता लायक हूं। गुणवत्ता का जो लक्ष्य मुझे प्राप्त करना है उसके लिए किये प्रयासों का अवलोकन करें। हर कार्य के लिए समुचित समय दें।

३. जीवन प्रणाली की आलोचना करने के बदले उसे सुधारने का यत्न करें। कार्यालय पहुंच कर सहयोगियों के साथ बैठ कर कार्य के सम्बन्ध में विचार विमर्श करें। कार्य स्थान पर गंभीरता से कार्य करें क्योंकि उस कार्य की सफलता से ही आपको प्रसन्नता मिलेगी।

४. कार्य गुणवत्ता नियंत्रण पर गंभीरता से विचार करें। मानव बुद्धि पैराशूट की तरह है, वह तभी कार्य करती है जब वह खुलती है। चाय के समय अपने सहयोगियों के साथ बैठकर देर से समाप्त होने वाली खामियों पर तथा उनके निवारण पर विचार करें। इन सब परेशानियों को कागज पर लिखें व लिखें इन परेशानियों के कारण कितना समय नष्ट हुआ।

५. अच्छा जब तक अच्छा नहीं होता जब सबसे अच्छा प्राप्त करने की इच्छा हो। गुणवत्ता भरपूर जीवन के लिए समय सीमा रखें। अपने कंधों पर सफलता की जिम्मेदारी लें। कागज़ पर लिखते रहें आपने अपने अधूरे कार्य को कहां छोड़ा था। समय बचने पर कोई दूसरा छोटा कार्य निपटायें।

६. ध्यान रहे मैं अकेला सफलता प्राप्त नहीं कर सकता, मेरी सफलता में हम यानिकि टीम शामिल है। पहले पुराना काम निपटायें। विचार करें इस कार्य को कैसे और सुधारा जा सकता है। कार्य में तेजी कैसे लाई जा सकती है। क्या सहयोगियों को सारी सुविधाएं उपलब्ध हैं जो उन्हें वास्तविक रुप से चाहिए ं

७. जब हम कार्य को गुणवत्ता के आधार पर नहीं उतारते तो हमें हानि होती है। इस हानि को “गुणवत्ता की कीमत” कहा जाता है। इससे बचने केलिए निम्न सात हानियों से बचें :-

(क) सही समय का इंतजार

(ख) परिवहन का इंतजार

( ग) सहयोगियों का इंतजार

(घ) कार्य विधि का अधूरा ज्ञान

(ड) भंडार का समुचित रिकार्ड न रखना

(च) अत्याधिक वस्तु का निर्माण

(छ) कार्य में खामियां।

८. गुणवत्ता प्रणाली पर बार बार विचार विमर्श करें। मानसिक सफलता दिल की तरह है। वह वहीं जायगा जहां उसकी तारीफ होगी। गुणवत्ता की तारीफ करें।

९. हर सफल कार्य के लिए सहयोगियों को पुरस्कृत करें। सहयोगियों का दिल जीतें। भविष्य के कार्यों के बारे में विस्तार से विचार विमर्श करें, उन्हें समझायें गुणवत्ता कैसे प्राप्त की जाय। उनके स्वाभिमान की रक्षा करें।

अनत में आप पायेंगे कि कोई कार्य अधूरा नहीं छूटा है। अगर है तो कार्यालय के समय  के बाद भी थोड़ी देर लगा कर उसे पूरा कर लें ताकि अगले दिन नया कार्य कर सकें। वापस जाने से पहले दिन भर के कार्यों का चलती नजर से अवलोकन कर लें।

तीन अनुशासन का कड़ाई से पालन करें :-

१. स्व अनुशासन (सेल्फ डिसीप्लिन)

२. प्राविधिक अनुशासन (टेक्निकल डिसीप्लिन)

३. संगठनात्मक अनुशासन (आर्गनाइजेशनल डिसीप्लिन)

घर जाकर संध्या करें।

प्रार्थना करें – हे ईश्वर ! मुझे आत्मबल दे जिससे मैं वो कार्य सफलतापूर्वक कर सकूं जो मैं करना चाहता हूं। मुझे धैर्य दे जिससे मैं सहयोगियों की वो गलतियां माफ कर सकूं जो मुझे पसन्द नहीं। हे ईश्वर! मझे शक्ति दे जिससे मैं सत्य व असत्य को अलग अलग देश सकूं।

तनाव का प्रभाव तीन तरीकों से कम किया जा सकता है। शारीरिक कसरतें, जैसे आराम, पैदल चलना अथवा प्राणायाम, संज्ञानात्मक नियंत्रण अथवा रचनात्मक ढंग से सोचना और अन्तर वैयक्तिक कौशल अर्जित करना तथा वातावरण को अपने अनुकूल बनाना।

अपने को शारीरिक और मानसिक दृष्टि से स्वस्थ रखने के लिए विभिन्न प्रकार की शारीरिक कसरतें जरूरी है और ये व्यायाम तनाव से निपटने की सबसे बढ़िया तकनीक सिद्ध हुए हैं। इनसे मनोरंजन होता है और मानसिक शांति मिलती है। नियमित व्यायाम से भावनात्मक शक्ति में वृद्धि होती है और एक स्वाभाविक आत्मविश्वास पैदा होता है। व्यायाम से स्नायु से संबंधित तनाव और चिंताएं दूर होती हैं क्योंकि इससे नाकारात्मक सोच और तर्कहीन विश्वास से जुड़े विचारों से छुटकारा मिलता है। पैदल चलना सबसे अच्छा व्यायाम है।

थकान की हद तक व्यायाम नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे नींद में व्यवधान आता है और कमजोरी आती है। नियमित रूप से पैदल चलकर तनाव और दबाव को दूर किया जा सकता है। आराम और आत्ममंथन की मदद से तनाव र दबाव दूर किये जा सकतें हैं। यह तकनीक आतंक का मुकाबला करने में कारगर साबित हुई है

अपने को ऐसे कमरे में अकेला छोड़ें , जहां कोई आपको तंग न करें। बिस्तर पर लेट जाओ, आंखें बंद करो और अपने शरीर को पूरी तरह विश्राम प्रदान करो। यह शारीरिक जड़ता मानसिक शांति बढ़ायेगी और दिमाग में अधिक सुझाव आयेंगे। ऐसा करते व्यक्त सोचना एकदम बंद कर देना चाहिए।

अविचारणीय के बारे में विचार करने का प्रयास करो और फिर से अपने चिन्तन को उस विचार की ओर केंद्रित करो जो आपको परेशान किए हुए है और उसे रुपांतरित करते हुए उसका मुकाबला करो, अपने आप से यह कहो, ” मैं किसी चिंता या भय से ग्रस्त नहीं हूं। मैं बेहतर कार्य कर सकता हूं, मैं पूरी तरह सही हूं।” समय अथवा अवकाश के अनुसार इस प्रक्रिया को बार बार दोहराइये, इस तरह के अनेक अवसर निकालिये, अगर आप पूरी क्षमता और विश्वास के साथ ऐसा करेंगे तो आपको सफलता अवश्य मिलेगी।

दबाव या तनाव दूर करने के अन्य तरीकों में तर्कसंगत विश्वास और रचनात्मक सोच विकसित करना, तनाव से छुटकारा पाने के लिए आत्म नियंत्रण विकसित करना और व्यक्तित्व के विकास के लिए आंतरिक संसाधनों का विकास करना, अपनी रुचि के अनुसार तनाव नियंत्रण के भौतिक आयामों से संबद्ध आदतें विकसित करना, जैसे योग, ध्यान, खेलकूद, ललित कलाएं और शिल्प, प्राणायाम, आदि और संबंध कौशल का विकास करना, शामिल है। आज के तनाव ग्रस्त जीवन में खुशहाल तनाव मुक्त जिंदगी जीने में ये सरल और व्यवहारिक विधियां सहायक साबित हो सकती हैं।

हम इस दिनचर्या से तनाव मुक्त होकर मानसिक संतुलन बनाए रखने में सफल हो सकते हैं और हम पायेंगे कि हमारे जीवन की गुणवत्ता में पहले से सुधार हुआ है।

उपरोक्त विवेचना से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि यदि हमको अपने जीवन की गुणवत्ता को बनाए रखना है तो सदैव उन मनोविकारों को नियंत्रण में रखना आवश्यक है जो हमारी गुणवत्ता संतुलन को नष्ट करके हमको एकांगी बनाकर, हमारे कार्य को पतन की ओर अग्रसर करते हैं।

कृपया सुझाव एवं विचार अवश्य प्रस्तुत करें।

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Rajeev Verma

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