राजीव वर्मा, वर्ष 1998 में स्वरचित व प्रकाशित
मैं गधा हूं। इस कलयुग का गधा। कहते हैं हर जीव अपने कर्मों के अनुसार ही संसार में जन्म लेता है। मैं बहुत दिनों से सोच रहा था कि मैं मनुष्यों से बात करुं परन्तु उचित माध्यम मिलने पर ही मैं आज आपके सामने आत्मव्यथा रखूंगा जिस पर समुचित ध्यान दें।
पहले मैं बता दूं, इस संसार ने मुझे “गधा” नाम देकर इतना प्रसिद्ध कैसे कर दिया क्योंकि जब भी कोई मूर्खता करता है तो उसे “गधा” की संज्ञा दी जाती है, कोई मेहनत करता है परन्तु उसका फल शूनय आता है तो उसे भी “गधा” कहा जाता है, अगर कोई भारी बोझा उठाता है तो उसे “गधे का बोझा” कहा जाता है, आदि आदि।
आखिर “गधे” की परिभाषा क्या हुई ? मेरी समझ से यह संज्ञा तो हो ही नहीं सकती। मैं अपने बारे में सोचता हुआ बड़े दुःखी मन से हरिद्वार में घूम रहा था।
कई सज्जनों/दुर्जनों से पत्थर डंडे खाता हुआ भागता भागता मैं हर की पौड़ी के सामने वाले इलाके में पहुंचा। वहां देखा, एक जगह बहुत भीड़ लगी थी। एक महात्मा गेरुआ वस्त्र धारण किए एक मंच पर बैठे हुए थे। उनके सामने बहुत बड़ी संख्या में लोग बड़े चाव से महात्मा जी के प्रवचन सुन रहे थे। मैं भी वहीं मंच के पास एक पेड़ की ओट में खड़ा हो गया।
प्रवचन के दौरान महात्मा जी का ध्यान अचानक मेरी ओर गया। वे बोले,”आज कलयुग में जो व्यक्ति सरल स्वभाव का होता है उसे चालाक व्यक्ति ‘गधा’ कहते हैं। जैसे ही उन्होंने गधा शब्द बोला, मेरे कान खड़े हो गए। महात्मा जी का प्रवचन चलता रहा जो व्यक्ति अति नम्र, अति परिश्रमी, अति सरल एवं सीधे स्वभाव वाला, कठोर वाणी सुनकर भी शान्त रहता हो, जिसमें बिलकुल भी चतुराई न हो, किसी भी कार्य के लिए कभी मना न करे, जो धूप में, वर्षा में, ठंड में, परिश्रम करता रहे, उसे आज कलयुग में चालाक एवं चतुर दुर्जन लोग “गधा” कहते हैं।
बहुत देर तक प्रवचन चलता रहा। प्रश्न आया कि मेरे मन की खट-पट ( हलचल, अशांति) कैसे मिटे ? बहुत सीधी सरल बात है कि मन की व्यथा, मन में जो खट पट है, वह अपने जानने में आती है। यह जो मन का एक संकल्प है कि यह आत्मव्यथा न रहे, यही खट पट का कारण है क्योंकि इस संकल्प से ही खट पट से संबंध बना रहता है।
जब सब चले गए तो महात्मा जी भी जाने के लिए सामान बांधने लगे। मैं जिज्ञासा से महात्मा जी की ओर बढ़ा। मुझे अपनी ओर बढ़ते हुए देख कर वह सहम गये। मैंने उनके पास पहुंच कर नम्र अभिवादन किया और खड़ा रहा। मुझे शांति पूर्वक खड़ा देख उनमें हिम्मत आई और फिर शांत स्वर में पूछा,”क्या बात है? अपने मन की व्यथा बताओ, मैं तुम्हारे अशांत मन को शांत करने का प्रयास करुंगा।”
मैं, गधा, बोला,”महाराज मैं अज्ञानी हूं। कृपया मेरा मार्गदर्शन करें। अब मैं आपको, अपना व महात्मा जी का वार्तालाप सुनाता हूं, जो कि इस प्रकार है:-
महात्मा,”बिलकुल अनजान का नाम अज्ञान नहीं है और केवल जानकारी भी ज्ञान नहीं है। हम कुछ जानते हैं और बहुत कुछ नहीं जानते, उसी का नाम अज्ञान है। अथार्त अधूरे ज्ञान को अज्ञान कहते हैं। दूसरा, अज्ञानी वह है जो जानता है, पर मानता नहीं।”
गधा: मनुष्य क्या जानता है ?
महात्मा: वह जानता है कि शरीर, कुटुम्ब, संसार, सब के सब पहले नहीं थे और फिर बाद में भी नहीं रहेंगे। परन्तु मैं (आत्मा) पहले भी था और शरीर के बाद भी रहूंगा।
गधा: परन्तु इस बात को वह मानता कहां है ?
महात्मा: हम शरीर और संसार को रखना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि शरीर निरोगी रहे, धन संपत्ति आ जाये, आदर सत्कार हो। परन्तु कौन नहीं जानता कि जिस शरीर और नाम को लेकर हम यह सब चाहते हैं, वह शरीर और नाम पहले भी था, पर वह आज याद ही नहीं है, ऐसे ही यह शरीर और नाम भी याद नहीं रहेगा जिसके लिए रात दिन परिश्रम कर रहे हैं, इसका नाम ही अज्ञान है।
गधा: परिवार में प्रेम और सुख शांति कैसे रहे ?
महात्मा: जब मनुष्य अपने उद्देश्यों को भूल जाता है, तभी सब बाधाएं आती हैं। प्रेम होता है, अपने स्वार्थ और अभिमान के त्याग से। दूसरों का भला कैसे हो ? दूसरों का कल्याण कैसे हो ? दूसरों को आदर सम्मान कैसे दें ? दूसरों को सुख आराम कैसे मिले ? यह सब जब आचरण में आ जाते हैं तब सब कुटुम्बी प्रसन्न रहते हैं।
गधा: परिवार में झगड़ा, कलह, अशांति, आदि होने का क्या कारण है ?
महात्मा: हर प्राणी अपनी इच्छा के अनुसार संबंध चाहता है, अपनी अनुकूलता चाहता है, अपना सुख आराम चाहता है, अपनी महिमा चाहता है, अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है – ऐसे व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण ही परिवार में झगड़ा, कलह, अशांति, आदि होने लगते हैं।
गधा: माता-पिता के आचरण, भाव आदि तो बड़े अच्छे हैं परन्तु उनकी संतानें अच्छी नहीं निकलती। इसका क्या कारण है ?
महात्मा: इसका खास कारण संग दोष अर्थात बालक को अच्छा संग न मिलना ही है। ऋणानुबंध से पूर्व जन्म का बदला लेने के लिए भी ऐसी संतान पैदा होती है। जो पुत्र कुसंग से बिगड़ता है, वह सत्संग से सुधर जाता है। परन्तु जो पूर्व जन्म का बदला लेने के लिए आता है, वह तो दुःख ही देने वाला होता है।
गधा: माता-पिता के आचरण तो अच्छे नहीं हैं पर उनकी संतान अच्छी निकलती है, इसका क्या कारण है ?
महात्मा: प्रायः मां बाप का स्वभाव ही संतान में आता है। पर ऋणानुबंध अथवा गर्भाधान के समय कोई अच्छा संस्कार पड़ने से अथवा गर्भावस्था में किसी संत महात्मा का संग मिलने से श्रेष्ठ संतान पैदा होती है।
गधा: माता-पिता की सेवा से क्या लाभ है ?
महात्मा: माता-पिता की सेवा से लोक परलोक दोनों सुधरते हैं। भगवान प्रसन्न होते हैं। जो पुत्र धन, जमीन, मकान आदि पाने की आशा से मां बाप की सेवा करता है, वह वास्तव में धन आदि की ही सेवा करता है। मां बाप की नहीं।
रामचरितमानस में तो हरेक के लिए कहा गया है:
” मंद करत जो करइ भलाई”(५/४९/७)”
अथार्त, अगर माता-पिता पुत्र का आदर करते हैं, तो आदर में पुत्र की सेवा खर्च हो जाती है। परन्तु वे आदर न करके पुत्र का निरादर करते हैं, तो पुत्र की सेवा पूरी रह जाती है। वे कष्ट देते हैं तो उस से पुत्र की शुद्धि होती है, सहनशीलता बढ़ती है, तप बढ़ता है, महत्व बढ़ता है।
माता-पिता की सेवा में माता-पिता के दिये हुए कष्ट को परम तप समझकर प्रसन्नता से सहना चाहिए और यह समझना चाहिए कि मेरे पर मां बाप की बड़ी कृपा है, जिससे मेरी सेवा जरा भी व्यय न होकर मेरे को शुद्ध सेवा, शुद्ध तपश्ररया का लाभ मिल रहा है। ऐसा अवसर तो किसी भाग्यशाली को ही मिलता है और मेरा यह अहोभाग्य ही है जो माता-पिता मेरी सेवा स्वीकार कर रहे हैं।
गधा: बच्चों को शिक्षा कैसे दी जाय, जिससे वे श्रेष्ठ बन जायें ?
महात्मा: बच्चे प्रायः देखकर ही सीखते हैं। इसीलिए माता-पिता को चाहिए कि वे उनके सामने आचरण अच्छे रखें, अपना जीवन संयमित और पवित्र रखें। ऐसा करने से बच्चे अच्छी बातें सीखेंगे और श्रेष्ठ बनेंगे। अच्छी शिक्षा वह होती है जिससे बालक व्यवहार में परमार्थ की कला सीख जाये।
गधा: महात्मा जी समय अधिक हो गया है, कृपया मोटी मोटी बात बतायें, मैं क्या करूं जिससे मेरा जीवन सफल हो जाये ?
महात्मा: मनुष्य आप ही अपना मित्र होता है और आप ही अपना शत्रु है और कोई दूसरा न तो शत्रु है और न ही मित्र। परिस्थिति का यदि सदुपयोग करें, तो वही परिस्थिति उद्धार करने वाली हो जाती है। मनुष्य में चार तरह की चाहत होती है – एक धन की, दूसरी धर्म की, तीसरी भोग की और चौथी मुक्ति की।
गधा: संसार में एक मनुष्य पुण्यात्मा है, सदाचारी है और वह दुःख पा रहा है तथा दूसरी ओर एक मनुष्य पापात्मा है, दुराचारी है और सुख भोग रहा है। इस बात को लेकर अच्छे-अच्छे मनुष्यों के भीतर भी यह शंका हो जाया करती है कि इसमें ईश्वर का न्याय कहां है ?
महात्मा: इसका समाधान यह है कि अभी पुण्यात्मा जो दुःख पा रहा है, यह पूर्व के किसी जन्म में किए हुए पाप का फल है, अभी किये हुए पुण्य का नहीं। ऐसे ही पापात्मा जो सुख भोग रहा है, यह भी पूरव के किसी जन्म में किए गए पुण्य का फल है, अभी किये गये पाप का नहीं। पुण्य और पाप का फल भोगने का कोई एक नियम नहीं है। पुण्य तो निष्काम भाव से भगवान को अर्पण करने से समाप्त हो जाता है परन्तु पाप भगवान के अर्पण करने से समाप्त नहीं होता
संसार की किसी भी वस्तु से मनुष्य का संबंध नहीं है। जब जायेंगे, तब साथ कुछ लेकर नहीं जायेंगे। बिलकुल कार्यालय के समान संसार में सेवा करने के लिए आए हैं। भजन उसी को कहते हैं, जिसमें भगवान का सेवन हो तथा सेवन भी वही श्रेष्ठ है, जो प्रेम पूर्वक मन से किया जाय। गृहस्थ को चाहिए कि वह धन कमाने की अपेक्षा बच्चों के चरित्र का ज्यादा ख्याल रखे, क्योंकि कमाये हुए धन को बच्चे ही काम में लेंगे। अगर बच्चे बिगड़ जायेंगे तो धन उनको और ज्यादा बिगाड़ेगा।
शोक, चिन्ता, भय, मोह और क्रोध, इनसे जो मुक्त है वह सदा मुक्त है। पैदाइश, पड़ोस, पवन, पानी , प्रकाश, पगताश, पवित्रता, और परमार्थ – ये आठ जहां सुलभ हों वहां रहना चाहिए। हो सके तो किसी का अन्न से, वस्त्र से, धन से, वचन से, विचार से और बुद्धी से भला कर देना, पर बुरा कभी भी नहीं करना।
किसी का भी अहित उसके अपने कुकर्मों से ही होता है। दूसरों को सुखी देखकर प्रसन्न होना, दुखी देखकर सहायता करना। तुम जैसा करोगे, वैसा ही तुम्हारे प्रति सारा जग करेगा। तुम यथाशक्ति दूसरे को सुखी करना चाहोगे तो सारा जगत तुम्हें सुखी करना चाहेगा। जब जब मन में अशांति हो तब तब समझना चाहिए कि हम भगवान को भूल गये हैं।
जब तुमको अपने गुरुजन, बड़े और पूज्य लोगों में दोष दिखाई देने लगे, सगे संबंधी अप्रिय लगने लगें और पराये लोग प्रिय लगें, पराये गुण दिखाई दें और स्वजनों में अवगुण सूझें, तब जान लो कि तुम्हारी दिशा उल्टी आ गयी और अल्पकाल में ही तुम दुःख में पड़ने वाले हो।
यह कहकर महात्मा जी वहां से प्रस्थान कर गये। मैं गधा वहीं खड़ा रह गया। मेरे दिमाग में महात्मा जी के विचारों का विश्लेषण होने लगा जो मेरे मन की व्यथा बन गयी।
मैंने जमाने को देखा है और जमाने ने मुझे। मैं गधा का गधा ही रह गया और जमाना बहुत तेजी से आगे बढ़ गया। बहुत महात्मा आये, बहुत चले गए। वे सब कहते रहे कि व्यक्ति को मुंह अंधेरे उठना चाहिए। महात्मा कह गये कि व्यक्ति को परिश्रमी होना चाहिए, पर मेरा गधा दिमाग पूछता है कि किस व्यक्ति को कब, कहां, कितना परिश्रम करना चाहिए, इस पर किसी ज्ञानी महात्मा ने प्रकाश नहीं डाला।
हमने तो बस महात्माओं की एक बात पर कान दिया कि परोपकार इंसान का धर्म है। तो जब भी कोई हम पर उपकार करता है, अपने राम यह सोचते हैं कि ये तो उसका धर्म था, कोई एहसान नहीं कर रहा हम पर।
जो बातें महात्मा जी ने बताईं वे मुझे, आपको और सम्पूर्ण सभ्य समाज को पहले से ही भली-भांति पता हैं, परन्तु उन्हें याद रखने का समय किसी गधे के पास नहीं है।
यही मेरे गधे मन की व्यथा है।
कृपया सुझाव एवं विचार अवश्य प्रस्तुत करें।