यमराज का नीति ज्ञान

राजीव वर्मा,  10 मई 1993 में स्वरचित एवं प्रकाशित

जब भगवान जीवन बांट रहे थे उस समय वह अच्छे मूड में नहीं थे। अभी तक जो उसने जीवन बांटे थे उन आत्माओं में से एक भी उसे ऐसा व्यक्ति नहीं मिला था जिससे अपने में अच्छे कर्म किये हों। खैर, बड़ी देर के इन्तजार के बाद मेरा नंबर आया। यमराज मुझे उनके सुपुर्द कर खुद दूसरे शिकार के लिए चले गये।

भगवान ने मेरे जीवन का लेखा जोखा सुना तो उनकी भंवे तन गई। उन्होंने बड़ी गंभीरता से मेरी ओर देखा, फिर एक लंबी गहरी सांस ली, बोले,”सच्चरित्र पुत्र, पतिव्रता स्त्री, प्रसन्नमुखी स्वामी, स्नेही मित्र, क्लेश रहित मन, रुचिर आकृति, स्थिर वैभव, विद्या से सुशोभित मुख, यह सब परमात्मा की प्रसन्नता से ही शरीर धारियों को प्राप्त होते हैं। तुमने जो दु:खों और कष्टों का भोग इस जीवन में किया है वह पिछले जीवन के कर्म थे। अभी उस जीवन के कुछ शेष कर्मों का फल और भोगना है। अब हम तुम्हारी इच्छा पूछते हैं कि तुम्हें कहां और किस प्रकार का जीवन चाहिए।”

इतनी नम्र वाणी सुन मैं भावविभोर हो गया और बोला,”हे ईश्वर, जो अपने श्रेष्ठ आचरण से पिता को प्रसन्न रखता है, जो अपने पति का हित चिन्तन करती है, वही पत्नी है और सुख दुःख दोनों अवस्थाओं में समान रहे, वही सच्चा मित्र है, इन तीनों की प्राप्ति पुण्यात्मा पुरुषों को ही होती है।”

यह सुन भगवान मुस्कराये और बोले,”मैं तुम्हे पृथ्वी पर पुरुष योनि में जन्म दे रहा हूं, लेकिन याद रहे कष्ट में रहते हुए भी तुम अपना विवेक मत खोना। तृष्णा का त्याग करो, क्षमा को अपनाओं, अहंकार को छोड़ दो, पाप से चित्त हटाओ, सत्य बोलो, सज्जनों के पदानुयायी बनों, विद्वानों की सेवा करो, मान्य पुरुषों का मान करो, विद्वेषी को भी प्रसन्न रखो, अपने गुणों को व्यक्त करो, यह सभी लक्षण सत्पुरुषों के हैं। अगर तुम इन्हें भूलोगे तो मैं तुम्हें समय समय पर कष्ट देकर तुम्हें याद दिलाता रहूंगा परन्तु सांसारिक भोग विलास में मेरी शिक्षा भूल मत जाना। जाओ तुम्हारी मां पृथ्वी पर तुम्हारा इंतज़ार कर रही है।” मैं भगवान को नमस्कार कर यमराज के साथ पृथ्वी पर आने के लिए साथ चल पड़ा।

तब यमराज ने कहा,”मैं जनकल्याण के लिए तुम्हें नीति ज्ञान दे रहा हूं। पृथ्वी पर जाकर इस ज्ञान का प्रचार करो, अपना और मानव जाति का कल्याण करो।”

“संसार में जो चरित्र दिखाई देते हैं, वे कल्याणकारी नहीं है। पुण्य कर्मों का फल जो स्वर्गादि हैं, वे भी भयरुप प्रतीत होते हैं। मनुष्य जीवन का एक ही सत्य है, वह है मृत्यु। मनुष्य क्या जानता है? वह यह जानता है कि शरीर, कुटुम्ब, संसार, सब के सब पहले नहीं थे और फिर बाद में भी नहीं रहेंगे। परन्तु मैं (आत्मा) पहले भी था और शरीर के बाद भी रहूंगा। परन्तु इस बात को हम मानते कहां हैं ! हम शरीर और संसार को रखना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि शरीर निरोगी रहे, धन संपत्ति आ जाये, आदर सत्कार हो। ईश्वर की निकटता में रहने वाले के पांव कभी नहीं भटकते। वह सच्ची सुख शांति पाता है। ईश्वर के प्रकाश में आते ही सारी की सारी कमजोरियां, पाप, सब नष्ट हो जाते हैं।

जीवों की हिंसा न करना, पराये धन को न हरना, सत्य बोलना, पूर्वकाल में यथाशक्ति दान करना, युवतियों की कथा में मौन रहना, तृष्णा को तोड़ना, गुरुजनों के प्रति विनय भाव रखना, सब जीवों पर दया करना, आदि सर्वशास्त्रों द्वारा बताया गया कल्याण मार्ग है। विधाता ने भाग्य में, अल्प या अधिक, जितना भी धन लिखा है, वह तो उसे मरुस्थल में भी प्राप्त होता ही है और उससे अधिक उसे मिल भी नहीं सकता। इसलिए जो है , उसी पर धैर्यपूर्वक सन्तोष करो और किसी धनवान के समक्ष दीनता व्यक्त न करो। देखो ! घड़े को कूप में डालो या समुद्र में, जल तो एकसमान ही भरेगा।

धन की तीन गति हैं : दान, भोग और नाश। धन का दान या भोग न किया जाय तो उसकी तीसरी गति ही हुआ करती है। परन्तु आज कलयुग में मानव सोचता है कि जिसके पास धन है, वही पुरुष कुलीन है, वही पण्डित है, वही विद्वान है, वही वक्ता और दर्शनीय है। यानि कि सभी गुण स्वर्ण रुपी धन के आश्रित हैं।

मृग और मछली क्रमशः घास खाकर और जल पीकर रहते हैं, तो भी शिकारी और मछेरे उनसे द्वेष रखते हैं। वैसे ही सज्जनों से दुर्जन अकारण ही बैर रखते हैं। जैसे दिन के प्रारंभ में घनी छाया रहती है और धीरे-धीरे घटती जाती है, फिर दिन के उत्तरार्द्ध के अन्त में छाया स्वल्प रहती है और बढ़ती जाती है, वैसे ही दुष्ट और सज्जन की मित्रता होती है।

हाथों की प्रशंसा दान करने में है, सिर की शोभा गुरुजन के चरणों में प्रणाम करने में है, मुख की शोभा सत्य बोलने में और भुजाओं की शोभा अपार बल प्रदर्शित करने में है। सज्जनों के लिए यह सब ऐश्वर्य और महान आभूषण हैं।

दान को गोपनीय रखना, घर पर अतिथि का स्वागत सत्कार करना, परोपकार करके चुप रहना, किसी अन्य द्वारा किए हुए उपकार को सभा में कहना, धन प्राप्त होने पर गर्व न करना, दूसरों की चर्चा में निन्दा भाव न लाना, यह तलवार की धार पर चलने के समान कठोर व्रत है। जैसे फल लगने पर वृक्ष झुक जाते हैं, वैसे ही समृद्धि को प्राप्त हुए सत्पुरुष भी झुक जाते हैं।

मनुष्यों की पूर्ण आयु सौ वर्ष की है। उसमें से आधी रात्रि में सोकर ही मनुष्य व्यतीत कर देता है, चौथाई बालकपन और वृद्धत्व में चली गई और शेष चौथाई व्याधि, वियोग दुःख एवं धनवानों की सेवा आदि में व्यतीत हुई। फिर जल की तरंगों के समान अत्यन्त चंचल इस जीवन में प्राणियों को सुख की प्राप्ति कहां हो सकती है ?

अरे मनुष्यों ! इस संसार में अनेक प्रकार के क्षणभंगुर सुखों को देने वाले जो भोग है, उन्हें जन्म मरण के कारण जानकर भी तुम यहां किस कारण घूमते हो ? ऐसे क्षणिक भोग के लिए प्रयत्न व्यर्थ है। मनुष्य नर्क, स्वर्ग और चौरासी लाख योनियों में जा सकता है, ज्ञान वैराग्य, भक्ति प्राप्त कर सकता है। मनुष्य ने उस स्वतन्त्रता का दुरुपयोग किया, इस कारण फंस गया और यदि अब यह स्वतंत्रता का सदुपयोग करे, आवश्यकता की पूर्ति करे और इच्छाओं का त्याग करे, तो बिलकुल ठीक काम हो जाय, इसमें किंचित मात्र भी संदेह नहीं है। मनुष्य केवल अपने अनुभव का आदर करे तो उसका काम बन जाये।

“इदं शरीरम !”

यह कहकर यमराज मुझे गर्भ में प्रवेश कराकर अदृश्य हो गए। मैं फिर से पृथ्वी पर आ गया। मैं ईश्वर से यही कामना करता हूं कि सब जगह खुशहाली आये और यमराज का नीति ज्ञान सभी के लिए श्रेष्ठ साबित हो।

कृपया सुझाव एवं विचार अवश्य प्रस्तुत करें।

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Rajeev Verma

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