दी करेक्टर इज़ बंडल आफ़ गुड हैबिट्स

राजीव वर्मा, वर्ष 1992 में स्वरचित

संसार का प्रत्येक व्यक्ति सदैव यही कामना करता रहता है कि उसे मनवांछित फल मिले। उसे उसकी इच्छित वस्तु की प्राप्ति हो। जो वह सोचता है या कल्पना करता है, वह उसे मिल जाए।

अपने पास जो कुछ भी है, वह क्यों है ?
मन में जिन वस्तुओं के प्रति आकर्षण होता है, उन्हें मनुष्य प्राप्त कर लेता है किन्तु शर्त यह भी है कि वह मनुष्य उसी विषय पर सोचता हो, उसके लिए प्रयास करता हो और आत्मविश्वास भी हो। इसी भांति यदि आप आशा, सफलता और सुख-समृद्धि चाहेंगे, उन्हीं के विषय में सोचेंगे और पाने के प्रयत्न करेंगे तो आप पा जाओगे।

आप वही सोचते हैं जो आप हैं।
आप क्या हैं ? यह जानने का तनिक प्रयास तो करें।

मनुष्य का व्यक्तित्व दो चीज़ों से मिलकर बना है। वह हैं: वंशानुगत एवं वातावरण। वंशानुगत में तो माता-पिता, दादा दादी और नाना-नानी के व्यक्तित्व की झलक होती है, कद, रूप, रंग होता है। किन्तु महत्वपूर्ण भूमिका व्यक्तित्व के बनाने में वातावरण का है। आप जो कुछ भी हैं, अपने वातावरण की देन हैं। आप जो सोचते हैं, जैसे वातावरण में रहते हैं, जैसे लोगों के बीच में रहते हैं, जैसी कल्पनाएं करते हैं, वैसे ही आप बन जाते हैं।

आप जो सोचते हैं, विचार करते हैं, विश्वास करते हैं, उसी में आपका जीवन ढलता चला जाता है। आप जैसे हैं, वैसे ही विचार आप दूसरों के लिए भी बनाने लगते हैं। जैसे आप स्वार्थी व्यक्ति हैं तो आप सामने वाले को भी स्वार्थी बतायेंगे। कुछ लोग जब सफल नहीं होते तो वे अपनी असफलताओं का दोष दूसरों पर डालकर कोसने लगते हैं। अपनी असफलता का दोष वे भाग्य, अपने माता-पिता, समाज और व्यवस्था पर डाल देते हैं। अपनी ग़लती को दूसरों के सिर मढ़ देते हैं।

कुछ लोग दूसरों से केवल ईर्ष्या तो करते हैं परन्तु प्रतिद्वंद्वी की भांति उनसे दोगुनी मेहनत करके उनसे आगे बढ़ने का प्रयास नहीं करते। दूसरों को धनवान देखकर भाग्य की बात करते हैं या फिर उन्हें भ्रष्ट कहकर चुप हो जाते हैं। परन्तु उनकी सफलता के पीछे जो लगन, जो पक्का संकल्प और इच्छा शक्ति रही है, उसे मूर्ख लोग नहीं देखते हैं।

जैसा आपका मन होगा, जैसा आप सोचेंगे, वैसा आपका स्वभाव बन जायेगा। जैसा आपका स्वभाव बन जायेगा, वैसा आप सोचेंगे और फिर आप अपने विचार शक्तियों के अनुसार बदले में फल पायेंगे। जैसे आप ईर्ष्या, द्वेष और क्रोध के विचारों से घिर जायेंगे, तो बदले में आपको ईर्ष्या, द्वेष और क्रोध ही मिलेगा। कुछ लोग जीवन की महानता को भूल जाते हैं। वे अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए किसी को भी हानि पहुंचा सकते हैं। ऐसे लोग अपनी इच्छाओं के लिए दूसरों का गला काटने का प्रयास करते हैं। आगे बढ़ने का यह तरीका गलत है।

आगे तो बढ़िये, खूब बढ़िये, दौड़िए किन्तु अपने विश्वास से, अपनी शक्ति से, अपने पांवों पर विश्वास करके। दूसरों को धक्का देकर या चोट पहुंचा कर या गिरा कर उनसे आगे निकलने का प्रयास यत कीजिए।

बहुत से लोग श्रम करने में शरमाते हैं। वे कोई शारीरिक परिश्रम करते हुए झिझकते हैं और उन्हें ऐसा लगता है जैसे वे कोई छोटा काम कर रहे हैं। जबकि कोई काम छोटा नही होता है। परन्तु बास को प्रसन्न करने के लिए उसके सामने हलका फुलका सामान इधर से उधर रखते हैं। उन मूर्खों को यह नहीं पता कि कर्म का फल मिलता है। वे यह भूल जाते हैं कि ईश्वर भी उन्हीं की सहायता करता है जो स्वयं अपनी सहायता करता है।

बहुत से लोग कहते हैं कि जरा जरा सी बात पर ध्यान नहीं देते। वे बहुत बड़ी ग़लती करते हैं। बात चाहे छोटी हो या बहुत बड़ी, वह एक बात तो है, वह एक घटना या दुर्घटना तो है। वह जीवन से सम्बन्ध रखने वाला कोई क्षण तो है। उसका प्रभाव जीवन पर पड़ सकता है या फिर पड़ता ही है। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में छोटी छोटी बातें आती रहती हैं। बहुत से लोग उनकी उपेक्षा करते हैं, उन पर ध्यान नहीं देते। “मामूली बात” कहकर टाल जाते हैं। परन्तु बात तो बात ही है जो दिमाग में अमिट रहती है। यही मामूली बात कभी कमाल कर दिखाती है या फिर किसी बड़े नश्वर एटम बम का असर छोड़ जाती है।

कभी कभी आप किसी की निन्दा कर अपना परिचय खुद दे देते हैं। आप किसी का कुछ नहीं बिगाड़ रहे फिर भी लोग आपके शत्रु बन रहे हैं, आपकी निन्दा कर रहे हैं। समाज में आप बुरे कहे जाते हैं, जबकि आप बुरे काम नहीं करते। आप ईमानदार आदमी है, परिश्रमी हैं, बस छोटा सा अवगुण है कि साधारण सी गलती करते हैं आप। अत: किसी भी छोटी सी गलती या भूल की उपेक्षा न करें। उसे मामूली बात समझकर अनदेखा न करें। यह सोचें कि वह भूल क्यों हुई ? कैसे हो गयी और उसका आपके जीवन, आपके मित्रों पर क्या प्रभाव पड़ेगा ? किस किस मित्र को खोया ।

कभी कभी हम अपने मित्रों को मजाक मजाक में बहुत सी ऐसी बातें कह देते हैं जिसका वे बुरा या बहुत बुरा मान जाते हैं परन्तु वे अपनी अप्रसन्नता को प्रकट नहीं करते हैं। आप ध्यान भी नहीं देते हैं। आप छोटी बातें या साधारण बातें समझकर टालते हैं, परन्तु उन मित्रों की नजर में आप गिर जाते हैं। वे आपको बुरा व्यक्ति समझने लगते हैं।

जो व्यक्ति खुद को ही नहीं जान सकता वह सृष्टि को कैसे जान सकेगा ? सबसे पहले स्वयं को पहचानना होगा। जब तक मनुष्य स्वयं को नहीं पहचानता है तब तक सृष्टि के रहस्यों को भी नहीं जान सकेगा। मनुष्य के जीवन का वह क्षण महत्वपूर्ण और महान होता है जब वह अपने अन्दर की शक्ति को पहचान लेता है। अपनी विशेषताओं को देख लेता है। मनुष्य में छुपा ईश्वरीय गुण प्रकट होता है। अपने सपनों को केवल सपना मत समझिए। आप जो ह्रदय में गहराई से इच्छा रखते हैं, वह सपना ही सच्चाई बन सकता है। जिसके ह्रदय में सन्देह है, आशंका है, अविश्वास है, वह जीवन में सफलताओं के शिखर तक नहीं पहुंच सकता।

जीवन में सफलता पाने के लिए यह परम आवश्यक है कि आप आत्मनिरिक्षण करके यह ज्ञात करते रहें कि लोगों में आपके प्रति क्या धारणाएं हैं। लोग आपको कितना पसन्द करते हैं और कितना नापसंद, यह व्यवहार और आचरण से पता चल जाता है। अपनी भूलों पर कुढिये नहीं। न ही पश्चाताप के आंसू बहाइये, बल्कि यह सोचिए कि अब भविष्य में ऐसी भूल से कैसे बचा जा सकता है।

आत्मनिरिक्षण से आपको यह जानकारी मिलेगी कि आप कितने लोकप्रिय हैं या कितने बदनाम ? आप कितने सफल हैं या कितने असफल ? आपमें कितने गुण हैं और कितने अवगुण ? बहुत से लोग ऐसे होते हैं जो मन ही मन यह समझे रहते हैं कि वे जो भी कहते हैं सभी सराह जा रहा है। उनकी बातों को पसंद किया जाता है। कभी वे गलत नहीं कहते। त्रुटियां नहीं करते जबकि वास्तविकता यह होती है कि उनकी हर बात समाज में बुरी कही जा रही है, सब उनकी निन्दा करते हैं, उनकी हर बात और कार्य त्रुटिपूर्ण होता है। उनके मुंह पर लोग उनकी आलोचना नहीं करते, इसलिए उन्हें वास्तविकता का पता नहीं चलता और वे गलतफहमी के शिकार रहते हैं।

जिसका ह्रदय घृणा, क्रोध, स्वार्थ और ईर्ष्या से भरा होता है, वह कभी भी प्रसन्नता नहीं पा सकता है। प्रायः हम लोग दूसरों के विषय में जो सोचते हैं, वे व्यवहार में जब आते हैं, उनसे जब वास्ता पड़ता है, तो कुछ और ही निकलते हैं। हम किसी को एक नेक, ईमानदार और शरीफ व्यक्ति समझकर उससे दोस्ती कर लेते हैं। घर आना जाना शुरू हो जाता है। मनुष्य के चरित्र का सबसे अच्छा पता उसकी छोटी छोटी बातों से लग सकता है जब वह सावधान नहीं होता है। जो मनुष्य बातें करते समय , कुछ बोलते समय लगातार सामने वाले व्यक्ति को स्पर्श करते हैं, कमीज़, कोट या टाई छूते या खींचते हैं, बांह पकड़ कर अपनी बात कहते हैं तो आप बुरा मत मानिये। वह व्यक्ति आत्मनिर्भर नहीं है और उसमें आत्मविश्वास की भी बहुत कमी है।

आप जानते ही हैं कि मिलनसार व्यक्ति मृदभाषी, व्यवहारकुशल और नम्र होता है इसलिए वह लोकप्रिय भी होता है। सभी उसकी प्रशंसा करते हैं। अधिकांश लोगों का स्वभाव होता है कि वे दूसरों को आगे बढ़ता हुआ नहीं देखना चाहते। ईर्ष्या का भाव उनके ह्रदय में होता है। वे दूसरों के कामों में रुकावटें डालते हैं। बाधाएं खड़ी करते हैं। ऐसे प्रवृत्ति के लोगों में कोई नेक, उत्साही, ईमानदार और महत्वकांक्षी व्यक्ति फिट नहीं बैठता है।

पूर्ण मनुष्य वही है, सच्चा मानव वही है जो दूसरों से प्रसन्न होता है, जिससे दूसरे प्रसन्न होते हैं। याद रहे संबंध कोई तोड़ता नहीं, खुद ब खुद टूटते चले जाते हैं। आप जितना मेल जोल समाज में बढ़ाते चले जायेंगे, उतना ही समाज से बदले में आपको प्रेम मिलता चला जायेगा। जो आप बांटेंगे, वही आपको प्राप्त होगा। आप प्यार बांटिये, बदले में आपको प्यार ही मिलेगा।

एक विद्वान ने कहा है :

चरित्र कभी भी श्रेष्ठ नहीं बन सकता, यदि आदतें अच्छी न हों।

“दी करेक्टर इज़ बंडल आफ़ गुड हैबिट्स अर्थात चरित्र आदतों का संग्रह है।”

कृपया सुझाव एवं विचार अवश्य प्रस्तुत करें।

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Rajeev Verma

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