राजीव वर्मा, वर्ष 1991 में स्वरचित
इस समय तुम गहरी नींद में सो रहे हो, तुम्हारा एक हाथ तुम्हारे गाल के नीचे दबा है और माथे पर आ गई पसीने की कुछ बूंदों से तुम्हारे बालों की एक लट चिपक गई है, मैं तुम्हारे कमरे में खड़ा तुम्हें निहार रहा हूं। अभी कुछ ही देर पहले जब मैं अपना अखबार पढ़ रहा था तो विषाद की लहर मेरा दम घोंटने लगीं थीं और मेरे ह्रदय में जगी अपराध भावना मुझे तुम्हारे कमरे में जगी अपराध भावना मुझे तुम्हारे कमरे में खींच लाई।
इस समय मेरे ह्रदय में एक के बाद एक भावों का ज्वर उमड़ रहा है। आज मैंने तुमको काफी डांटा जब तुम स्कूल जाने के लिए कपड़े पहन रहे थे। तुमने अपना मुंह भी ठीक से नहीं साफ किया था। तुम्हारे जूतों में पालिश नहीं थी। मैंने देखा कि तुम्हारी सभी वस्तुएं कमरे में बेतरतीब बिखरी पड़ी थी। नाश्ते की मेज पर भी मैं तुम्हारी गलतियों पकड़ता रहा। ” चम्मच ठीक से पकड़ो, यह न करो, वह न करो, तेजी से न खाओ, नाश्ता कहीं भागा नहीं जा रहा। फिर तुमने मेज पर कोहनियां टेकीं ? तमसे कितनी बार मना किया नहीं मानते तुम ? कब समझ आयेगी तुम्हें ? ” तुम चुपचाप खाते रहे। स्कूल जाते वक्त तुमने मुझे आवाज दी : “टा… टा… पापा” और मेरे भवों पर बल पड़ गए। ” तुम्हारे हाथों में जूठन लगी है, जाओ हाथ धोओ”।
तीसरे पहर यही सिलसिला फिर शुरू हो गया। जब मैं आफिस से आया तो तुम घुटने के बल बैठकर गोलियां खेल रहे थे। तुम्हारी मोजों में छेद थे। मैंने तुम्हारे दोस्तों के सामने ही तुम्हारी भर्त्सना की। रात को खाना खाते समय मैं जानबूझकर तुमसे नहीं बोला। तुम बार बार मेरा मुंह देख रहे थे, शायद मैं कोई बात या उपदेश प्रारंभ करूं। पर मैं चुप्पी मारे रहा। जानबूझकर अनदेखा करता रहा मानो खाने की मेज पर तुम थे ही नहीं।
खाने के बाद मैं एक पत्रीका लेकर पढ़ने जा ही रहा था कि तुम मेरे पास सहमें हुए से आये पर बोले कुछ नहीं। “अब क्या बात है ?” , मैंने पूछा। तुम एक क्षण के लिए रूके फिर दौड़ कर मेरे पास आये और मेरी कमर के चारों ओर अपने हाथ लपेट कर अपना बदन से सटा कर कहा,”पापा ! आप कितने अच्छे हो”! मैं ठगा सा खड़ा रह गया।
एकाएक मुझे एहसास हुआ कि तुम्हारे नन्हे से ह्रदय में स्नेह का जो कुंड है वह अभी सूखा नहीं है। मेरी हर तरह की झिड़की, डांट और फटकार ने तुम्हारे मासूम दिल में मेरे प्रति प्यार में कोई कमी नहीं आने दी है, और यह सच्चाई तुम्हारे निष्कपट व्यवहार से कितनी साफ झलकती है।
मेरे लाल, बस इसके बाद से ग्लानि और पश्चात्ताप की जो भावना मुझे घेरे है, उससे मैं छुटकारा नहीं पा सका हूं। एकाएक मुझे न जाने क्या हुआ कि मैं तुम्हारे कमरे में आने के लिए बेबस हो गया और तुम्हें देख कर मैं सोच रहा हूं कि तुम कितने महान हो। तुमने मेरी किसी बात का कभी भी बुरा नहीं माना।
मेरे प्रति तुम्हारे स्नेह में कभी कमी नहीं हुई। मेरा मन होता है कि तुमको जगाकर प्यार करूं, अपने ह्रदय के भाव तुमको बताऊं, पर मैं जानता हूं कि तुम मेरी बातें अभी समझ न सकोगे। तुम बहुत छोटे हो। पर मैं तुम्हें विश्वास दिलाना चाहता हूं कि कल से मैं अपना व्यवहार बदलूंगा। मैं तुमको एक आदर्श पिता बनकर तुम्हारी परवरिश करूंगा।
यह विचार मेरे बचपन में थे अपने पिताजी के लिए। जैसे जैसे मैं बड़ा होता गया, मैंने देखा कि पिताजी का यही व्यवहार और खराब होता चला गया । इस निरन्तर खराब व्यवहार के कारण आगे जाकर मेरे द्वारा विद्रोह के रूप में फूटा जो कि परिवार के लिए बहुत हानीकारक साबित हुआ। उसे पढ़ियेगा मेरे लेख “विद्रोह” में – राजीव वर्मा
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